कुरआन क्या है ?

रमज़ान के महीने में की जाने वाली इबादतें

रमज़ान

रमज़ान महीने की बरकत और पवितर्ता से हम उसी समय लाभ उठा सकते हैं जब हम अपने बहुमूल्य समय का सही प्रयोग करेंगे, इस कृपा, माफी वाले महिने में सही से अल्लाह तआला की पुजा- अराधना करेंगे जिस तरह से प्रिय रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अल्लाह तआला की पुजा- अराधना किया है। वह इबादतें करेंगे जिसके करने से हमें पुण्य प्राप्त हो और हमारी झोली पुण्य से भर जाए और हमारा दामन पापों से पाक साफ हो जाए और उन कामों से दुर रहा जाए जो इस पवित्र महीने की बरकत तथा अल्लाह की कृपा, माफी से हमें वंचित  (महरूम) कर दे।

रमज़ान के महीने की सब से महत्वपूर्ण इबादत रोज़ा (ब्रत) है जिसे उसकी वास्तविक हालत से रखा जाए और उन कामों तथा कार्यों से दूर रहा जाए जो रोज़े को भंग ( खराब) कर दे। रोज़े रखने के लिए सब से पहले रात से ही या सुबह सादिक़ से पहले ही रोज़े रखने की नीयत किया जाए। इस लिए कि जो व्यक्ति रात में ही रोज़े की नीयत न करेगा, उस का रोज़ा पूर्ण न होगा। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन हैः ” जो व्यक्ति रात ही से रोज़े की नीयत न करे, उस का रोज़ा नहीं। ” ( अल- मुहल्लाः इब्नि हज़्म, अल-इस्तिज़्कारः इब्नि अब्दुल्बिर)

रमज़ान के मुबारक महीने में निम्नलिखित कार्य अल्लाह को खुश करने के लिए किया जाए।

1-  सेहरीः  रोज़े रखने के लिए सब से पहले सेहरी खाया जाए क्योंकि सेहरी खाने में बरकत है, सेहरी कहते हैं सुबह सादिक़ से पहले जो कुछ उपलब्ध हो, उसे रोज़ा रखने की नीयत से खा लिया जाए। रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः ” सेहरी खाओ क्योंकि सेहरी खाने में बरकत है “। (सही बुख़ारीः 1923), एक दुसरी हदीस में आया है ” सेहरी खाओ यदि एक घोंट पानी ही पी लो। ” (

2 –  फजर की नमाज़ के बाद से सूर्य निकलने तक मस्जिद में बैठ कर ज़िक्र – अज़्कार करनाः

यदि कोई व्यक्ति फजर की नमाज़ के बाद से सूर्य निकलने तक मस्जिद में बैठ कर ज़िक्रो अज़्कार करता है तो उसे बहुत ज़्यादा पुण्य मिलता है। जैसा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः ” जिस ने फजर की नमाज़ पढ़ा और अपने स्थान पर बैठे ज़िक्रो अज़्कार करता रहा फिर सूर्य निक्ला और उसने दो रकआत नमाज़ पढ़ा तो उसे एक उमरे का पुरा पुरा सवाब (पुण्य) प्राप्त होगा, ( सुनन तिर्मिज़ी)

3 –  रोज़े की हालत में गलत सोच – विचार से अपने आप को सुरक्षित रखा जाएः  फजर से पहले से लेकर सूर्य के डुबने तक खाने – पीने तथा संभोग से रुके रहना ही रोज़ा की वास्तविक्ता नहीं बल्कि रोज़ा की असल हक़ीक़त यह कि मानव हर तरह की बुराई, झूट, झगड़ा लड़ाइ, गाली गुलूच, तथा गलत व्यवहार और गलत सोच – विचार तथा अवैध चीज़ो से अपने आप को रोके रखना ही रोज़े का लक्ष्य है और उसे पुण्य उसी समय प्राप्त होगा जब वह इसी तरह रोज़े रखेगा, जैसा कि रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन हैः ” जो व्यक्ति अवैध काम और झूट और झूटी गवाही तथा जहालत से दूर न रहे तो अल्लाह को कोई अवशक्ता नहीं कि वह भूका, पीयासा रहे।”       ( बुखारी )

यदि कोई व्यक्ति रोज़ेदार व्यक्ति से लड़ाइ झगड़ा करने की कोशिश करे तो वह  लड़ाइ, झगड़ा न करे बल्कि स्थिर से कहे कि मैं रोज़े से हूँ, जैसा कि रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन हैः ” जब तुम में कोइ रोज़े की हालत में हो तो आपत्तिजनक बात न करे, जोर से न चीखे चिल्लाए, यदि कोइ उसे बुरा भला कहे या गाली गुलूच करे तो वह उत्तर दे, मैं रोज़े से हूँ।”           ( बुखारी तथा मुस्लिम)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन हैः ” कितने ही रोज़ेदार एसे हैं जिन के रोज़े से कोई लाभ नहीं, केवल भुखा और पियासा रहना है। ” ( मिश्कातुल मसाबीह )

गोया कि रमज़ान महीने में अल्लाह तआला की ओर से दी जाने वाली माफी, अच्छे कामों से प्राप्त होनी वाली नेकियाँ, उसी समय हम हासिल कर सकते हैं जब हम रोज़े की असल हक़कीत के साथ रोज़े रखेंगे ।

4 –  क़ुरआन करीम की ज़्यादा से ज़्यादा तिलावत किया जाएः  

अल्लाह तआला ने पवित्र क़ुरआन इस मुबारक महीने में मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर फरिश्ते जिब्रील के माध्यम से उतारा, जैसा कि  अल्लाह तआला का इरशाद हैः ” रमज़ान वह महीना है जिस में क़ुरआन उतारा गया जो इनसानों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है और ऐसी स्पष्ट शिक्षाओं पर आधारित है जो सीधा मार्ग दिखानेवाली और सत्य और असत्य का अन्तर खोलकर रख देने वाली है।”  ( सूरः बक़रा,185)

यही वजह है कि फरिश्ते जिब्रील हर रमज़ान के महीने में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को क़ुरआन का दौरा कराते थे। इस्लामिक विद्ववानों ने भी इस महीने में क़ुरआन बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे। वैसे भी क़ुरआन आम दिनों में पढ़ने से बहुत सवाब प्राप्त होता है परन्तु जो व्यक्ति रमज़ान के महीने में क़ुरआन ध्यान से पढ़ेगा, उस पर विचार करेगा, उस पर अमल करेगा, एसे व्यक्ति के दामन में नेकियाँ की नेकियाँ होंगी।

5 –  रोज़े की हालत में ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह ही से दुआ किया जाएः  

दुआ भी एक इबादत है जो केवल अल्लाह से माँगा जाए। अल्लाह तआला रोज़ेदार की दुआ को अस्वीकार नहीं करता है जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का इरशाद हैः ” तीन लोगों की दुआ अल्लाह के पास स्वीकारित हैं , रोज़ेदार की दुआ , मज़्लूम की दुआ और यात्री व्यक्ति की दुआ ”  (सहीहुल-जामिअः शैख अल्बानीः 3030)

इसी तरह रोज़ा खोलते समय भी ज़्यादा दुआ करना चाहिये , उस समय की दुआ अल्लाह तआला वापस नहीं करता है। जैसा कि हदीसों से वर्णित है।

6 –  रातों में क़ियाम और तरावीह पढ़ने का महीनाः

इस मुबारक महीने की रातों को तरावीह पढ़ने का खास इह्तमाम किया जाए क्योंकि तरावीह पढ़ने का बहुत ज़्यादा सवाब (पुण्य) है जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन हैः ” जो व्यक्ति रमज़ान महीने में अल्लाह पर विश्वास तथा पुण्य की आशा करते हुए रातों को तरावीह (क़ियाम करेगा) पढ़ेगा, उसके पिछ्ले सम्पूर्ण पाप क्षमा कर दिये जाएंगे ”  ( बुखारी तथा मुस्लिम)

7- माहि रमज़ान में उम्रा किया जाएः  

रमज़ान के महीने में उम्रा करने से भी बहुत ज़्यादा नेकी प्राप्त होती है। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान हैः ” बेशक हज्ज और उमरा अल्लाह के रास्ते में से है और रमज़ान में उम्रा करने का पुण्य मेरे साथ उम्रा करने के बराबर सवाब (पुण्य ) मिलता है।” (सहीहुल-जामिअः शैख अल्बानीः 1599)

दुसरी हदीस में आया है कि ” जैसा की उम्मे सुलैम ने रसूल (सल्ल)  से गिला किया कि ऐ अल्लाह के रसूलः अबू तल्हा और उनका बेटा उमरा के लिए चले गए और मुझे छोड़ दिया तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः ऐ उम्मे सुलैम! रमज़ान में उम्रा करने का पुण्य मेरे साथ हज करने के बराबर सवाब (पुण्य ) मिलता है ” (तरगीब व तरहीबः 177/2)

8 – रमज़ान महीने में अधिक से अधिक सदक़ा – खैरात तथा दान दिया जाएः  

इस पवित्र महीने में ग़रीबों और मिस्कीनों की दिल खोल कर सहायता और मदद करना उचित और बहुत ज़्यादा सवाब ( पुण्य) का काम है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान हैः ” सब से अच्छा दान, रमज़ान में दान देना है।” ( सुनन तिर्मिज़ी )

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इस महीने में बहुत दान ( सदक़ा – खैरात ) किया करते थे जैसा कि अब्दुल्लाह बिन अब्बास( रज़ियल्लाह अन्हुमा ) वर्णन करते हैं: ” रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) लोगों में सब से अधिक दानशील थे और रमज़ान के महीने में आप ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की दानशीलता बहुत बढ़ जाती थीं। जब आप ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) फरिश्ते  जिब्रील से मुलाक़ात करते थे। फरिश्ते  जिब्रील के साथ आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)  क़ुरआन पढ़ते- दोहराते थे। रमज़ान के महीने में आप ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की दानशीलता तेज़ हवा से बढ़ जाती थीं।”     ( मुसनद अहमद)

9 –  रोज़ेदार को इफतार कराया जाएः

भूके को खाना खिलाना भी बहुत बड़ा पुण्य है और जिसन किसी भूके को खिलाया और पिलाया अल्लाह उसे जन्नत के फल खिलाएगा और जन्नत के नहर से पिलाएगा जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है ” जिस किसी मोमिन ने किसी भूके मोमिन को खिलाया तो अल्लाह उसे जन्नत के फलों से खिलाएगा और जिस किसी मोमिन ने किसी पियासे मोमिन को पिलाया तो अल्लाह उसे जन्नत के बिल्कुल शुद्ध पैक शराब पिलाएगा ”   ( सुनन तिर्मिज़ी )

जो रोज़ेदार को इफतार कराएगा तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवा ब(पुण्य) मिलेगा और दोनों के सवाब में कमी न होगी जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है ” जिसने किसी रोज़ेदार को इफतार कराया तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब (पुण्य) प्राप्त होगा मगर रोज़ेदार के सवाब में कुच्छ भी कमी न होगी ” (मुसनद अहमद तथा सुनन नसई )

10-  रमज़ान के महीने में इतकाफ़ किया जाएः  

इतकाफ़ अर्थात, मानव ईबादत की नीयत से मस्जिद में प्रवेश हो और दुनिया दारी को छोड़ कर केवल अल्लाह की इबादत, क़ुरआन की तिलावत और दुआ और अपने गलतियों पर अल्लाह से माफी मांगे। इसी तरह जितने समय या जितने दिन के इतकाफ़ की नीयत किया है, वह अवधि पूरा करे और मानवीय अवश्क्ता के सिवाए मस्जिद से बाहर न निकले। इतकाफ़ रमज़ान और रमज़ान के अलावा महीने में भी किया जासकता है, परन्तु रमज़ान के महीने में इतकाफ़ करना ज़्यादा उत्तम है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रमज़ान के महीने में इतकाफ़ करते थे। जैसा कि आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि ” रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ग्यारा रमज़ान से लेकर बीस रमज़ान तक इतकाफ़ किया फिर बीस रमज़ान से लेकर तीस रमज़ान तक इतकाफ़ किया और फिर इसी पर जमे रहे और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बाद आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पत्नियों ने भी आखीरी दस दिनों का इतकाफ़ किया। ( बुखारी तथा मुस्लिम)

11- शबे क़दर की रातों को तलाश किया जाए और उन रातों में बहुत ज़्यादा इबादत की जाएः 

यह वह मुबारक और पवित्र रात है जिस की महत्वपूर्णता पवित्र क़ुरआन तथा सही हदीसों से परमाणित है। यही वह रात है जिस में पवित्र क़ुरआन को उतारा गया। यह रात हज़ार रातों से उत्तम है। जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है। ” हम्ने इस (कुरआन) को कद्र वाली रात में अवतरित किया है। और तुम किया जानो कि कद्र की रात क्या है ? कद्र  की रात हज़ार महीनों की रात से ज़्यादा उत्तम है। फ़रिश्ते और रूह उसमें अपने रब की अनुज्ञा से हर आदेश लेकर उतरते हैं। वह रात पूरी की पूरी सलामती है उषाकाल के उदय होने तक। ” (सुराः कद्र)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के हदीस से भी इस रात की बरकत और फज़ीलत साबित होती है। इसी लिए (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने शबे क़दर की रातों को तलाशने का आदेश दिया है। ” जैसा कि आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि ” रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने  फरमायाः ” कद्र वाली रात को रमज़ान महीने के अन्तिम दस ताक वाली रातों में  तलाशों ”  ( बुखारी तथा मुस्लिम)

12-  अल्लाह से क्षमा और माफी माँगी जाएः

यह महीना पापों , गुनाहों , गलतियों से मुक्ति और छुटकारा का महीना है। मानव अपनी अप्राधों से मुक्ति के लिए अल्लाह से माफी मांगे, अल्लाह बहुत ज़्यादा माफ करने वाला , क्षमा करने वाला है। विशेष रूप से इस महीने के अन्तिम दस रातों में अधिक से अधिक अल्लाह से अपने पापों , गलतियों पर माफी मांगी जाए जैसा कि आईशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वर्णन करती हैं कि मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से प्रश्न क्या कि यदि मैं क़द्र की रात को पालूँ तो क्या दुआ करू तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः ” ऐ अल्लाह ! निःसन्देह तू माफ करने वाला है, माफ करने को पसन्द फरमाता, तो मेरे गुनाहों को माफ कर दे।”

अल्लाह हमें और आप को इस महिने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे।    आमीन…………

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