कुरआन क्या है ?

यात्रा के शिष्टाचार

यात्रा सीमित दिनों के लिए किसी विशेष उद्देश्य के अंतर्गत होती है।

यात्रा सीमित दिनों के लिए किसी विशेष उद्देश्य के अंतर्गत होती है।

इनसान अपने जीवन में मुक़ीम होता है या यात्री। इक़ामत अथवा निवास वह स्थान है जहाँ एक व्यक्ति हमेशा के लिए रहता या ठहरता है जब कि यात्रा सीमित दिनों के लिए किसी विशेष उद्देश्य के अंतर्गत होती है। इसमें सामान्य स्थिति से निकल कर एक व्यक्ति विशेष स्थिति में आ जाता है जहाँ पर उसका नये लोगों से सम्पर्क होता है और विभिन्न प्रकार की परेशानियाँ भी होती हैं इसी लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः

السفر قطعة من العذاب يمنع أحدكم طعامه وشرابه ونومه، فإذا قضى نهمته فَليُعجل إلى أهله   رواه البخاري ومسلم

“ सफर अज़ाब का एक टुकड़ा है, जो तुम में से एक आदमी के खाने पीने और सोने में बाधा डालता है। अतः जब तुम में से एक व्यक्ति अपनी ज़रूरत पूरी कर ले तो अपने परिवार की ओर लौटने में जल्दी करे।“ (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

सफ़र का अर्थः

यात्रा को अरबी भाषा में सफ़र कहते हैं जिसका अर्थ होता है “ ज़ाहिर होना ““विदिता होना“ और मुसाफिर को मुसाफिर इस लिए कहा जाता है कि यात्रा वास्तव में सफ़र करने वाले के चेहरे को ज़ाहिर करती और उसकी नैतिकता को प्रकट करती है।

यात्रा के भेदः

यात्रा हुक्म के अनुसार पाँच प्रकार की होती हैः

(1)     वाजिब यात्राः यह हज्ज और उमरा की अनिवार्य यात्रा है।

(2)     हराम यात्राः जैसे हराम कामों के लिए सफर करना या महिला का बिना मुहरिम के सफर करना।

(3)     मुस्तहब यात्राः ऐसे उमरा के लिए यात्रा करना जो वाजिब न हो।

(4)     मुबाह (जाइज़): जाइज़ व्यापार के लिए यात्रा करना।

(5)     मकरूह यात्राः जैसे अकेले यात्रा करना। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः

لو يعلم الناس ما في الوحدة ما أعلم ما سار راكب بليل وحده    البخارى 

“यदि लोग जान लेते कि अकेले सफर करने की क्या हानि है जैसे मैं जानता हूं तो कोई सवार अकेले रात में न चलता।”(सहीह बुख़ारी)

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अकेले सफर करने की हानियाँ नहीं गिनाई ताकि इसकी गंभीरता खुल कर सामने आ सके। और अलेके सफर करने की अवैधता रात और दिन दोनों को शामिल है परन्तु रात को विशेष रूप में इस लिए बयान किया गया क्यों कि इस में बुराई और भय की सम्भावना अधिक होती है। 

यात्रा के शिष्टाचारः

यात्रा के शिष्टाचार और अहकाम की जानकारी प्राप्त कर लें:

यात्रा के शिष्टाचार और अहकाम की जानकारी प्राप्त कर लें, जैसे नमाज़ों में क़स्र (चार रकअत की नमाज़ें दो रकअत पढ़ना) जमअ (दो नमाज़ों को एकत्र करना) तयम्मुम तथा मोज़े पर मसह करना आदि।

अच्छे और नेक मित्र की संगत अपनायें:

सफ़र के लिए अच्छे और नेक दोस्त का चयन करें : क्यों कि इनसान अपने दोस्त के तरीक़े पर होता है, और दोस्ती का इनसान पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि दोस्त अच्छा रहा तो इनसान अच्छा बनता है और यदि दोस्ता बुरा रहा तो इनसान बुरा बनता है। इस लिए सफ़र के लिए भी अच्छे दोस्त का चयन करना चाहिए।

मित्रों और सम्बन्धियों से मिललें तथा बड़े लोंगों से दुआयें ले लें:

 अपने दोस्तों तथा रिश्तेदारों से मिल लें और नेक लोगों से मिल कर उन से दुआयें और वसीयतें ले लें:हज़रत अबू हुरैरा रज़िय. का बयान है कि एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं सफर करना चाहता हूं कुछ वसीयत कीजिए। तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः अल्लाह के तक़वा को लाज़िम पकड़ो और हर ऊंचे स्थान पर तकबीर कहो। जब वह व्यक्ति वहाँ से लौटने लगा तो आप ने कहाः

اللَّهُمَّ اطْوِ لَهُ الأَرْضَ، وَهَوِّنْ عَلَيهِ السَّفَرَ».  الترمذي (3445)، وهذا لفظه، ابن ماجه 2771

“ऐ अल्लाह इस के लिए धरती को समेट दे और उसका सफ़र आसान कर दे।” ( तिर्मिज़ी 3445 इब्ने माजा 2771)

मुसाफिर मुक़ीम को और मुक़ीम मुसाफिर को क्या दुआयें देगाः

सफर के समय मुक़ीम को चाहिए के मुसाफिर से कहेः

   «أَسْتَوْدِعُ الله دِيْنَكَ، وَأَمَانَتَكَ، وَخَوَاتِيْمَ عَمَلِكَ». الترمذي 3443   السلسلة الصحيحة رقم (14

मैं तेरे दीन, तेरी अमानत और तेरे कामों के परिणाम को अल्लाह के हवाले करता हूं। (तिर्मिज़ी 3443)

और मुसाफिर को चाहिए कि मुक़ीम को यह दुआ देः

  «أَسْتَودِعُكَ الله الَّذِي لا يُضِيعُ وَدَائِعَهُ». أحمد  9230)، السلسلة الصحيحة رقم (16

मैं तुझे उस अल्लाह के हवाले करता हूं जिसके हवाले की हुई जीज़ कभी नष्ट और बर्बाद नहीं होती।

यदि सफर में तीन अथवा उस से अधिक हों तो किसी एक को अपना अमीर बना लें:

इस्लाम ने एकत्रा पर बल दिया और अनेकता से रोका है। सुनन अबी दाऊद की रिवायत है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः  

إذا خرج ثلاثة في سفر فليؤمروا أحدهم   رواه أبو داود 

” जब तीन व्यक्ति किसी यात्रा पर निकलें तो उन्हें चाहिए कि किसी एक को अपना अमीर बना लें।”

सफर की स्थिति में तीन या उस से अधिक व्यक्तियों में से किसी एक को अमीर बनाने की हिकमत यह है कि उनका मामला पूरे सफर में अच्छे तरीक़े से चलता रहे और उनके बीच किसी प्रकार का मतभेद न हो सके।

महिला का महरम बिना सफर करना मना हैः

शरीअत ने महिला के लिए बिना महरम के सफर करना मना किया है:

لا يحل لامرأة تؤمن بالله واليوم الآخر أن تسافر مسيرة يوم وليلة ليس معها محرم  رواه البخاري ومسلم

“किसी महिला के लिए जो अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखती हो वैध नहीं कि एक दिन और एक रात का सफ़र बिना किसी मुहरिम के करे।”

यहाँ तक कि एक महिला हज और उमरा की यात्रा भी बिना किसी महरम के नहीं कर सकती। बुखारी और मुस्लिम की रिवायत है हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि. बयान करते हैं कि उन्हों ने अल्लाह के रसूल सल्ल. को फरमाते हुए सुनाः कोई परुष किसी महिला के साथ एकांत में न हो, और न कोई महिला महरम के बिना सफर करे। अतः एक व्यक्ति खड़ा हुआ और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने फलाँ फलाँ युद्ध में नाम लिखाया है और मेरी पत्नी हज्ज के लिए निकल रही है। आप ने फरमायाः

اذهب فحج مع امرأتك رواه البخاري ومسلم

जाओ और अपनी पत्नी के साथ हज्ज करो। (बुखारी, मुस्लिम)

गुरुवार के दिन सुबह में सफर करना उत्तम हैः

अल्लाह के रसूल सल्ल. गुरुवार के दिन सुबह में सफर करना पसंद करते थे जैसा कि सहीह बुख़ारी और मुस्लिम की रिवायत है कि आप सल्ल. तबूक युद्ध के लिए गुरुवार को निकले और आप को गुरुवार के दिन सफर करना प्रिय था। और मुस्नद अहमद की एक रिवायत में है कि

 قل ما كان رسول الله  يخرج إذا أراد سفراً إلا يوم الخميس 

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब यात्रा का संकल्प करते तो अधिकतर गुरुवार के दिन ही निकलते थे। (मुस्नद अहमद)

प्रातःकाल में जगना अब मुस्लिम समाज में सपना बनता जा रहा है। हालांकि इस उम्मत को प्रातःकाल में बर्कत दी जाती है। सुनन अबी दाऊद की रिवायत है सख़्र अल-ग़ामदी रज़ि. कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः

اللهم بارك لأمتي في بكورها

ऐ अल्लाह तू मेरी उम्मत की सुबह में बर्कत प्रदान कर।

हदीस के रावी सख़्र व्यापारी थे, वह अपना व्यापार करने के लिए अपने आदमी को सुबह में भेजते थे अतः वह बड़े घनी हो गए और उनकी सम्पत्ति में वृद्धि आ गई।

यात्रा की दुआः

जब सवारी पर सवार हो जायें तो यह दुआ पढ़ें:

الله أكبر الله أكبر الله أكبر سُبْحانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ (13) وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ  [الزخرف:14،13]  اللهم إنا نسألك في سفرنا هذا البر والتقوى، ومن العمل ما ترضى، اللهم هون علينا سفرنا هذا واطو عنا بعده، اللهم أنت الصاحب في السفر، والخليفة في الأهل، اللهم إني أعوذ بك من وعثاء السفر وكآبة المنظر، وسوء المنقلب في المال والأهل  

 अल्लाह सब से महान है, अल्लाह सब से महान है,अल्लाह सब से महान है, पाक है वह जिसने इस को हमारे क़ाबू में कर दिया, हालांकि हम इसे अपने क़ाबू में न कर सकते थे। ऐ अल्लाह! हम अपने इस सफर में तुझ से नेकी और तक़वा का सवाल करते हैं और उस अमल का सवाल करते हैं जिसे तू पसंद करे। ऐ अल्लाह! हमारा यह सफर हम पर आसान कर दे, और इसकी दूरी को हमारे लिए समेट कर कम कर दे। ऐ अल्लाह! तू ही सफर में साथ और घर वालों में नायब है ( अर्थात् घर वालों का निरीक्षक है) ऐ अल्लाह! मैं तुझ से सफर की कठिनाई और माल तथा परिवार के विषय में ग़मग़ीम करने वाले मंज़र से और नाकाम लौटने की बुराई से तेरी पनाह चाहता हूं।

और जब सफर से वापस लौटे तो ऊपर वाली दुआ कि अतिरिक्त यह दुआ भी पढ़ेः

آئبون تائبون عابدون لربنا حامدون

हम वापस लौटने वाले, तौबा करने वाले, इबादत करने वाले और अपने रब की ही प्रशंसा करने वाले हैं। (सहीह मुस्लिम)

सफर के बीच की दुआयें:

हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि सफर की स्थिति में जब हम लोग किसी ऊंचे स्थान पर चढ़ते तो तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहते और जब नीचे उतरते तो तस्बीह (सुब्हानल्लाह) कहते थे।

जब मुसाफिर सुबह करे तो यह दुआ पढ़ेः

سَمِعَ سَامِعٌ بِـحَمْدِ اللَّـهِ، وَحُسْنِ بَلائِهِ عَلَيْنَا، رَبَّنَا صَاحِبْنَا، وَأفْضِلْ عَلَيْنَا عَائِذاً بِاللـهِ مِنَ النَّارِ

एक सुनने वाले ने हमारी ओर से अल्लाह की प्रशंसा और उसके हम पर जो अच्छे इनआमात और एहसानात हैं उनका शुक्र सुना। ऐ हमारे रब हमारा साथी बन जा और हम पर दया फरमा, मैं आग से पनाह मांगते हुए यह दुआ करता हूं। (सहीह मुस्लिम)

सफर के बीच जब मुसाफिर किसी स्थान पर उतरे तो उसे यह दुआ पढ़ना चाहिएः

أعوذُ بكلماتِ اللهِ التَّامَّاتِ  مِن شَرِّ ما خلق

मैं अल्लाह के सम्पूर्ण कलिमात के साथ शरण चाहता हूं उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की है। (सहीह मुस्लिम )

 जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी गांव या शहर में प्रवेश करते तो यह दुआ पढ़ते थेः

اللَّهمَّ ربَّ السَّمواتِ السَّبعِ وما أظللن ، وربَّ الأرضينالسَّبعِ وما أقللن ،  وربَّ  الشَّياطينِ  وما أضللن ،  وربَّ الرِّياحِ وما ذرَيْن ، فإنَّا نسألُك خيرَ هذه القريةِ وخيرَ أهلِها ونعوذُ بك من شرِّها وشرِّ أهلِها وشرِّ ما فيها 

ऐ अल्लाह ऐ सातों आसमानों के मालिक, और उन चीज़ों के रब जिन पर उन्हों ने साया कर रखा है और सातों ज़मीनों के रब और उनके रब जिन चीज़ों को उन्हों ने उठा रखा है, और शैतानों के रब और उन चीज़ों के रब जिन्हें उन्हों ने गुमराह किया है और हवाओं के रब और जो कुछ उन्हों ने उड़ाया है। मैं तुझ से इस गांव की भलाई और इस गांव में रहने वालों की भलाई का सवाल करता हूं और उस चीज़ की भलाई का सवाल करता हूं जो इसमें है। और मैं इस गांव की बुराई और इसके रहने वालों की बुराई से तेरी पनाह चाहता हूं और उन चीज़ों की बुराई से तेरी पनाह मांगता हूं जो इस में है। ( शैख़ इब्ने बाज़ ने इसे हसन कहा है।

यात्री को चाहिए कि पूरे सफर के बीच अपने लिए, अपने परिवार के लिए और प्रत्येक मुसलमानों के लिए अधिक से अधिक दुआ करे क्यों कि सफर की हालत में मुसाफिर की दुआ क़ुबूल होती है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः

 ثلاث دعوات مستاجابات لا شك فيهن: دعوة الوالد، ودعوة المسافر، ودعوة المظلوم  رواه أبوداود، وحسنه الألباني

“तीन प्रकार की दुआयें अवश्य स्वीकार की जाती हैं, बाप की दुआ, मुसाफिर की दुआ और मज़लूम की दुआ।“ (अबू दाऊद, अल्लामा अल्बानी ने इसे हसन कहा है)

सफर में नमाज़ः

यात्रा की स्थिति में यात्री को दो प्रकार की छूट मिलती है। एक क़स्र और दूसरी जम्अ। क़स्र का अर्थ होता है चार रकअत की नमाज़ों को दो दो रकअत करके अदा करना। जैसे ज़ुहर, अस्र और ईशा की नमाज़ें यत्रा की स्थिति में दो दो रकअत अदा की जाएंगी। और जम्अ का अर्थ होता है दो नमाज़ों को एक साथ एकत्र करके पढ़ना, इसकी भी दो सूरत है, एक यह कि बाद वाली नमाज़ को पहली वाली नमाज़ के अंदर अदा कर लिया जाए, जैसे ज़ुहर और अस्र की नमाज़ ज़ुहर के समय में अदा की जाए इसे जम्अ तक़दीम कहते हैं। दूसरी सूरत यह कि पहले समय की नमाज़ को विलंब किया जाए यहां तक कि दूसरी नमाज़ का समय आ जाए जिसमें यात्री पहली नमाज़ को पहले अदा करे उसके बाद उस समय की नमाज़ अदा करे जैसे ज़ुहर की नमाज़ अस्र के समय में अदा की जाए, इसे जम्अ ताख़ीर कहते हैं।

यात्रा की स्थिति में सवारी पर बैठ कर नफिल नमाज़ें पढ़ना भी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है। (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)  इस लिए यात्री के लिए उत्तम है कि नफ़िल और वित्र की नमाज़ें अपनी सवारी पर बैठ कर पढ़े।

सफर चाहे गाड़ी की हो, या ट्रेन या फ्लाइट की हर हालत में नमाज़ का समय होने पर नमाज़ पढ़ ली जाए, हाँ यदि किसी को विश्वास है कि मंज़िल पर उतरने तक नमाज़ का समय बाक़ी रहेगा तो उसे विलंब करने में कोई हर्ज नहीं।

सफर की स्थिति में उतरते और खाते समय एकत्र होना उत्तम हैः

एकत्र होने में एकता है और बिखरने में फूट है इसी लिए इस्लाम ने यात्रा की स्थिति में भी चेतावनी दी कि उतरते और खाते समय एकत्र हो जाएं।

अबू सालबा अल-ख़ुशनी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि (सफर की स्थिति में) लोग जब किसी स्थान पर उतरते तो वादियों और घाटियों में बिखर जाते थे, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन से कहाः

إن تفرقكم في هذه الشعاب والأودية إنما ذلكم من الشيطان، فلم ينزل بعد ذلك منزلاً إلا انضم بعضهم إلى بعض حتى يقال لو بسط عيهم ثوب لعمهم  رواه أبو داود، وصححه الألباني

” तुम्हारा इन वादियों और घाटियों में बिखर जाना शैतान की ओर से होता है, उसके बाद जब कभी किसी मंज़म पर उतरते तो हर एक परस्पर एक दूसरे से मिल कर बैठते थे यहाँ तक कि कहा जाता कि यदि उप पर एक कपड़ा बिछा दिया जाए तो सब को काफी हो।” (सुनन अबी दाऊद, अल्लामा अल-बानी ने इस हदीस को सही कहा है)

यात्री का रात में घर वालों के पास आना अप्रिय हैः

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मना किया कि एक व्यक्ति अपने परिवार के पास रात में आए। और सही मुस्लिम की एक रिवायत में आया है कि जब तुम में से कोई रात में सफर से वापस हो तो अचानक अपने परिवार के पास न आए, (कुछ प्रतिक्षा कर ले) यहाँ तक कि ताकि पति से दूर रहने वाली महिलायें अपनी शरीर के ज़ाइद बाल साफ कर लें और अपने बिखरे बालों को संवार लें। (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

हदीस में जो ममानिअत आई है उसका कारण यही है कि बिना सूचित किए एक व्यक्ति घर पहुंच जाता है तो सम्भव है कि ऐसी चीज़ें देखे जो उसे अप्रिय लगे। औऱ जब सूचित कर दिया हो तो पत्नी पूरे तौर पर स्वागत के लिए तैयार रहेगी। और विदित है कि यह काम आजकल के युग में फोन द्वारा सरलतापूर्वक अंजाम पा सकता है।

जब शहर में आये तो उत्तम है कि मस्जिद जाकर दो रकअत पढ़ लेः

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा था कि जब आप सफर से आते तो सब से पहले जो काम करते थे वह मस्जिद में जा कर दो रकअत नमाज़ अदा फरमाते। काब बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं : जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम चाश्त के समय सफर से लौट कर आते तो मस्जिद में दाख़िल होते और बैठने से पहले दो रकअत पढ़ते थे।

यह वह सुन्नत है जो हमारे समाज से निकल चुकी है और शायद ही कोई होंगे जो इस सुन्नत को व्यवहारिक जीवन में लागू करते होंगे। जरूरत है कि आज इस पर अमल किया जाए।

     

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