कुरआन क्या है ?

अप्रिल फूल एक सामाजिक बुराई

april fool jokesअल्लामा इक़बाल ने कहा थाः

उठा कर फेंक दो बाहर गली में

 नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे

नवीन संसकृति के इन गंदे अण्डों पर गर्व करने और पश्चिम की बिना सोचे समझे नक्क़ाली की  जिज्ञासा ने हमारे समाज में विभिन्न बुराईयों को जन्म दिया है जिनकी एक समय पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उन्हीं सामाजिक बुराइयों में से एक अप्रिल फूल भी है। अप्रिल की प्रथम तिथि को एलेक्ट्रानिक और प्रिंट मेडिया हम से झूठ बोलवाता है। मनोरंजन के लिए….मज़ाक़ करने हेतु….दूसरों को मुर्ख सिद्ध करने के लिए…दूसरों को परीशान करने के लिए… दूसरों को आश्चर्यचकित करने के लिए।

इस झूठ ने न जाने कितने लोगों को आर्थिक हानि पहुंचाया है। कितने लोगों की जानें चली गई हैं। किसी को उसके घर में आग लगने की सूचना दी गई अचानक वह होश खो बैठा। किसी को उसकी पत्नी के दूसरों के साथ शारीरिक सम्बन्ध की ख़बर दी गई यहाँ तक कि दोनों में मतभेद शुरू हो गया। किसी को उसकी माता, उसके पिता, उसकी बेटी, उसकी पत्नी के मृत्यु की अचानक सूचना दी गई जिसे सुनने की ताब न ला सका और जीवन से हाथ धो बैठा।

यह प्रथा जिसका आधार झूठ, फ्राड और मुर्ख बनाने पर है, यह मानव आचरण के माथे पर कलंक का टीका तो है ही उसके साथ साथ इसका ऐतिहासिक पहलू भी अति निन्दनीय है। हम अभी इस विषय में नहीं जाना चाहते और न हमारा यह उद्देश्य है, हम तो मात्र यह बताना चाहते हैं कि सच्चाई नैतिकता में एक उत्तम गुण है, जिस पर नुबूवत का आधार है, जो हर खूबी का स्रोत है, प्रकृति की आवाज़ है, मानवता की पहचान है। जबकि झूठ नैतिकता में सब से बुरा स्वभाव है, जिस पर सारी शरीअतें सहमत हैं। जो हर बुराई का स्रोत है, जो प्रकृति से विद्रोह है और जो एक व्यक्ति को मानवता से निकाल बाहर करता है।
इस्लाम एक स्वभाविक धर्म है, इसकी सारी शिक्षायें सच्चाई पर आधारित हैं, विश्वास हो, इबादत हो, नैतिकता हो और मानव जाति के आपसी सम्बन्ध हों, इस्लाम हर विभाग में सच्चाई का आदेश देता है। कल्मा ला इलाहा इल्लल्लाह तब तक सही नहीं होता जब तक कि उसे सच्चे दिल से स्वीकार न किया जाएगा, इबादत तब तक इबादत नहीं कहला सकतीं जब तक कि उनके शिष्टाचार और शर्त को ध्यान में रखते हुए सच्चे दिल से उन्हें अदा न किया जाए। किसी को गवाह बना रहे हैं चाहे हमारा भाई ही क्यों न हो गवाही में सच्चाई होनी चाहिए, अगर हल्की सी झूठ आ गई तो इस्लाम की नज़र में हम दोषी बन जाते  हैं। व्यापार कर रहे हैं, लेन देन हो रहा है तो वहाँ भी सच्चाई पर आधारित व्यवसाय होना चाहिए, अगर झूठ आ गया तो व्यापार से बरकत निकल जाती है और हम अल्लाह के प्रकोप के हकदार ठहरते हैं। बल्कि
 झूठ प्रत्येक बुराईयों की जड़ है, विनाश का स्तम्भ और तबाही का द्वार है। इस्लाम ने झूठ की गणना महापापों में की है। अल्लाह ने फरमायाः 

‏{‏إِنَّمَا يَفْتَرِي الْكَذِبَ الَّذِينَ لاَ يُؤْمِنُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأُوْلـئِكَ هُمُ الْكَاذِبُونَ‏}‏ ‏[‏سورة النحل‏:‏ آية 105‏]‏

“झूठ तो बस वही लोग घड़ते है जो अल्लाह की आयतों को मानते नहीं और वही हैं जो झूठे हैं।”

और अल्लाह तआला ने सूर आले इमरान आयत न. 61 में फरमायाः

‏ ‏{‏فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ‏}‏ ‏[‏سورة آل عمران‏:‏ آية 61‏]‏‏.‏

 “झूठों पर अल्लाह की लानत भेजें।”

इस्लाम की दृष्टि में झूठ बोलना नेफाक़ की पहचान बताई गई है। झूठ मुनाफीक़ीन की सिफत है, हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु  से रिवायत है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः

آية المنافق ثلاث‏:‏ إذا حدث كذب، وإذا وعد أخلف، وإذا ائتمن خان  – صحيح البخاري : 33، صحيح مسلم:   59  

“कपटाचारियों की तीन पहचान हैः जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो वादाख़िलाफी कर जाए और जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़ियानत कर जाए।”

सही मुस्लिम की रिवायत है, मुहम्मद सल्ल. ने फरमायाः

عليكم بالصِّدقِ . فإنَّ الصِّدقَ يهدي إلى البرِّ . وإنَّ البرَّ يهدي إلى الجنَّةِ . وما يزالُ الرَّجلُ يصدُقُ ويتحرَّى الصِّدقَ حتَّى يُكتبَ عند اللهِ صِدِّيقًا . وإيَّاكم والكذِبَ . فإنَّ الكذِبَ يهدي إلى الفجورِ . وإنَّ الفجورَ يهدي إلى النَّارِ . وما يزالُ الرَّجلُ يكذِبُ ويتحرَّى الكذِبَ حتَّى يُكتبَ عند اللهِ كذَّابًا – صحيح مسلم:  2607

” तुम हमेशा सच बोला करो, क्योंकि सच नेकी की ओर अग्रसर करता है। और नेकी जन्नत (स्वर्ग) का रास्ता देखाती है। एक व्यक्ति हमेशा सच बोलता और सच की तलाश में रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के हाँ लिख दिया जाता है कि “यह अति सच्चा व्यक्ति है”। और तुम झूठ से बचते रहो, क्योंकि झूठ पाप की ओर ले जाता है, और पाप नरक तक पहुंचा देता है, और एक व्यक्ति सदैव झूठ बोलता और झूठ की खोज में लगा रहता है यहाँ तक कि अल्लाह के हाँ लिख दिया जाता है “यह बहुत झूठ बोलने वाला है”।

इस्लाम में झूठ हर समय निषेध है। वर्ष के किसी भी महीने में झूठ की अनुमति नहीं। बच्चों से मामला कर रहे हों और उन्हें पुकारने की ज़रूरत आ तो झूठी तसल्ली देकर बुलाना भी इस्लाम की नज़र में झूठ माना जाता है। सुनन अबी दाऊद की रिवायत है अब्दुल्लाह बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मेरी माँ में मुझे एक दिन बुलाया, जबकि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व  सल्लम मेरे घर में बैठे थे, आपने कहाः तुमने क्या देने का इरादा किया है ? मेरी माँ ने कहाः मैं उसे खुजूर देना चाहती हूं। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः

 أما إنك لو لمْ تُعطيهِ شيئًا كُتبتْ عليكِ كَذِبةٌ   صحيح أبي داود4991

“सुन लो! अगर तुम उसे कुछ न देती तो यह भी तुम्हारे ख़िलाफ झूठ लिखा जाता।” (सही अबी दाऊदः 4991)

कुछ लोग समझते हैं कि मनोरंजन के लिए झूठ बोलना वैध है हालाँकि झूठ हर स्थिति में झूठ है मनोरंजन में भी इसका पाप इतना ही है जितना सचमुच झूठ बोलने का है। सुनन अबूदाऊद, तिर्मिज़ी और नसाई की हदीस है मुहम्मद सल्ल. ने फरमायाः 

ويل للذي يحدث بالحديث ليضحك به القوم فيكذب ويل له ويل له  – سنن الترمذي: 2315 

बर्बादी है उसके लिए जो लोगों से बात करता है और उन्हें हंसाने के लिए झूठ बोलता है, बर्बादी है उसके लिए, बर्बादी है उसके लिए

यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल सल्ल۔ ने मनोरंजन हेतु डराने से भी मना किया, सुनन अबी दाऊद की रिवायत है, अब्दुर्रहमान बिन अबी लैला कहते हैं कि हम से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों ने बयान किया कि वे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ सफर में होते थे, एक बार किसी सफर में एक व्यक्ति सो गया, एक दूसरा व्यक्ति उसके पास गया और उसकी रस्सी उठाई तो वह डर गए, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सूचना मिली तो आपने फरमायाः

لَا يَحِلُّ لِمُسْلِمٍ أَنْ يُرَوِّعَ مُسْلِمًا – سنن أبي داود:5004 

किसी मुसलमान के लिए वैध नहीं है कि किसी दूसरे मुसलमान को डराए

बल्कि अल्लाह के रसूल सल्ल. ने इस बात को बहुत बड़ा विश्वासघात बताया है कि आप किसी व्यक्ति से झूठ बोलें और वह आपको सच समझ रहा हो, सुनन अबीदाऊद की रिवायत है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः

‏كبرت خيانة أن تحدث أخاك حديثًا هو لك به مصدق وأنت له به كاذب‏ – سنن أبي داود: 4971 

“यह बहुत बड़ा विश्वासघात है कि तुम अपने भाई से कोई बात कहो वह तुम्हें सच्चा समझ रहा हो और तुम उस से झूठ बोल रहे हो।” 

तात्पर्य यह कि झूठ का व्यक्तिगत तथा समाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, झूठ से सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। कारोबार से बरकत उठ जाती है। मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सकों ने भी शारीरिक जीवन पर झूठ की विभिन्न हानियाँ बताईं हैं। इस धरती पर पाए जाने वाले प्रत्येक धर्मों ने भी झूठ से रोका और उस पर प्रंतिबंध लगाया है। कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसमें झूठ की अनुमति दी गई हो। तो आइए हम संकल्प लेते हैं कि जीवन में हमेशा सच बोलेंगे और झूठ से हर हालत में दूर रहेंगे। 

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