कुरआन क्या है ?

मानव स्वतन्त्र पैदा हुआ है।

दास

अल्लाह तआला ने मानव को स्वतन्त्र पैदा किया है। मानव केवल अल्लाह का दास है और अल्लाह का ही गुलाम है। जिसने मानव की रचना अपनी पुजा के लक्ष्य से किया है। जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है।

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ﴿الذاريات: ٥٦﴾

मैंने तो जिन्नों और मनुष्यों को केवल इस लिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करे। (सूरह ज़ारियातः 56)

अल्लाह के पास तमाम मनुष्य एक समान है। कोइ बड़ा नहीं और नहीं कोइ छोटा है। बल्कि अपने कर्मानुसार अल्लाह के पास प्रसिद्ध माना जाएगा। जैसा कि अल्लाह का फरमान है।

يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ‌ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَ‌فُوا إِنَّ أَكْرَ‌مَكُمْ عِندَ اللَّـهِ أَتْقَاكُمْ إِنَّ اللَّـهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ‌ ﴿الحجرات: ١٣﴾

ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के पास तुम में सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है जो तुममें अल्लाह का सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखने वाला है।   (सूरह हुजरातः 13)

जिस समय मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबी बना कर भेजे गए। उस समय अरब और पूरी धरती का रीति रेवाज और समाजिक परंपरा देखें तो आप को मालूम होगा। पूरी धरती पर जुल्म और अत्याचार फैला हुवा था। मनुष्य मनुष्य का जानी दुश्मन बना हुआ था। शक्तिवर कमज़ोर पर अत्याचार करता था, लूट खसुट बहुत ज़्यादा थी। महिला के साथ एक वस्तु समान व्यवहार किया जाता था, महिल को समाज में कोइ मूल्य न था, महिला पर अत्यन्त अत्याचार किया जाता था। इसी प्रकार शक्ति शाली कम्ज़ोर व्यक्ति को दास बना कर, उसे पैसे के बदले बेच देता था। मानव की खरीदारी बहुत सार्वजनिक बात थी। परन्तु इस्लाम ने मानव को मानव की गुलामी से आज़ाद कराने में महत्वपूर्ण भुमिका निभाइ। नाहक किसी को गुलाम बनाने को बहुत बड़ा पाप शुमार किया और पहले से गुलाम व्यक्तियों को आज़ाद करना बहुत से पापों के लिए प्रायश्चित करार दिया। किसी स्वतन्त्र व्यक्ति को दास बनाना बहुत बड़ा अपराध करार दिया और जो लोग किसी स्वतंत्र व्यक्ति को दास बना कर बेच देते हैं। तो क़ियामत के दिन अल्लाह तआला स्वयं ही ऐसे लोगों का हिसाब लेंगे। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फरमान है।

قال اللَّهُ تعالى : ثلاثةٌ أنا خَصمُهمْ يومَ القيامَةِ : رجلٌ أعطى بي ثمَّ غدر ، ورجل باع حُرَّا فأكل ثمنَهُ ، ورجلٌ استأجَرَ أجيرًا فاستوفى منه ولم يعطِهِ أجرَهُ. (صحيح البخاري: 2270)

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने फरमायाः मैं क़ियामत के दिन तीन प्रकार के लोगों का विशेष रूप में हिसाब लूंगा। एक आदमी ने मुझ से वचन लिया और फिर उस वचन को तोड़ दिया, और एक व्यक्ति ने स्वतन्त्र व्यक्ति को बेच दिया और उस पैसा को प्रयोग किया और एक व्यक्ति ने किसी मजदूर से पुरा काम करवाया और फिर उसे उसकी मजदूरी न दिया। (सही बुखारीः 2270

जो व्यक्ति किसी स्वतन्त्र व्यक्ति को दास बना लेता है तो अल्लाह तआला ऐसे व्यक्ति पर इस क़दर करोधित होता है कि उसकी नमाज़ ही स्वीकार नहीं करता है। इस हदीस पर विचार करें।

ثلاثةٌ لا يقبلُ اللهُ تعالى منهمْ صلاةً : الرجلُ يؤمُ قومًا و همْ لهُ كارهونَ، و الرجلُ لا يأتِي الصلاةَ إلا دِبَارًا، و رجلٌ اعْتَبَدَ مُحَرَّرًا.  ( الجامع الصغير للسيوطي: 3536. حديث حسن)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः अल्लाह तआला तीन व्यक्तियों की नमाज़ें स्वीकार नहीं करेगा। ऐसा व्यक्ति जो लोगों की इमामत करे हांलाँकि लोग ना पसन्द करता हों। और आदमी जो हमेशा अन्तिम समय में नमाज़ अदा करे, और एक आदमी जिसने किसी स्वतन्त्र व्यक्ति को गुलाम बना ले। (अलजामिअ अस्सगीरः अस्सुवतीः 3536

बल्कि उस समय के गुलाम बनाने के रीति रेवाज के विपरीत गुलाम स्वतन्त्र करने पर उत्साहित किया है। मानव को मानव के दास्ता से मुक्ति पर बहुत ज़्यादा पुण्य का वादा किया है। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः

أيما رجلٍ مسلمٍ أعتق رجلًا مسلمًا ، فإنَّ اللهَ تعالى جاعلٌ وقاءَ كلِّ عظمٍ من عظامِه عظمًا من عظامِ محرِّرِه من النَّارِ ، وأيما امرأةٍ أَعتقت امرأةً مسلمةً ، فإنَّ اللهَ تعالى جاعلٌ وقاءَ كلِّ عظمٍ من عظامِها عظمًا من عظامِ مُحَرِّرَتِها من النَّارِ يومَ القيامةِ  –   2728: الألباني  : صحيح الجامع


जिस किसी मुस्लिम ने किसी मुस्लिम गुलाम को स्वतन्त्र किया तो बेशक अल्लाह तआला उस गुलाम के प्रत्येक हड्डी के बदले उसके प्रत्येक हड्डी को जहन्नम से मुक्ति देगा। और जिस किसी मुस्लिम महिला ने किसी मुस्लिम महिला दासी को स्वतन्त्र किया तो बेशक अल्लाह तआला उस दासी के प्रत्येक हड्डी के बदले उसके प्रत्येक हड्डी को जहन्नम से मुक्ति देगा। (सहीहुल जामिअः शैख अल्बानीः 2726

गुलाम को स्वतन्त्र करने के विभिन्न तरीके को अपनाने का आदेश दिया और उनकी स्वतन्त्रता के लिए बैतुलमाल से मदद करने पर उत्साहित किया बल्कि ज़कात के माल को भी गुलाम स्वतन्त्र करने में लगाया जा सकता जैसा कि ज़कात के माल खरच करने के तरीके की आयत में स्पष्टिकरण है। उन गुलामों के प्रति नरमी और सहाया के हेतू इस आयत पर विचार करें।

 وَالَّذِينَ يَبْتَغُونَ الكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوَهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْراً وَآتُوهُم مِّن مَّالِ اللَّهِ الَّذِي آتَاكُمْ…(سورة النور: 33)

 और तुम्हारे गुलामों में से जो कोई कुछ तुम्हें दे कर स्वतन्त्रा का मुआहिदा करे तो तुम उन से वह मुआहिदा कर लो  जब तुम्हें यदि मालूम हो कि उनमें भलाई है। और उन्हें भी अल्लाह के माल में से कुछ दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है। (24-सूरह अन्नूरः 33

मुस्लिम समाज जिन्हें अल्लाह ने धनदौलत से नवाजा है। वह दासों और दासियों की स्वतन्त्रा में अपनी भूमिका निभाने की ओर कदम बढ़ाने का आदेश दिया और ज़कात के माल को खरच करने के आठ जगहों में से एक गुलाम और दासियों की आजादी करार देंगे।

إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَ‌اءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّ‌قَابِ وَالْغَارِ‌مِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّـهِ وَابْنِ السَّبِيلِ ۖ فَرِ‌يضَةً مِّنَ اللَّـهِ ۗ وَاللَّـهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ .( سورة التوبة: ٦٠

ज़कात तो बस ग़रीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए है, जो ज़कात के काम करने पर नियुक्त हों और उनके लिए जिनके दिलों को आकृष्ट करना औऱ परचाना अभीष्ट हो और गुलाम आजाद कराने और क़र्ज़दारों और तावान भरनेवालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है। यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुआ हुक्म है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है। (9- सूरह तौबाः 60)

इसी प्रकार किसी व्यक्ति ने अपने दासी से विवाह किया और उस से पुत्र या पुत्री जन्म हुआ तो वह शिशू और माता दोनों स्वतन्त्र हो जाऐंगे। और शिशू के जन्म के बाद ही न तो उस दासी और बच्चे को बेचा जा सकता और न ही उन्हें गिफ्ट ही दिया जा सकता है।

इसी प्रकार गुलामों और दासियों को स्वतन्त्र करना बहुत से पापों से प्रायश्चित का कारण बनता है। उदाहरणः जान बूझ कर किसी की हत्या करना बहुत बड़ा पाप है। कातिल को बहुत पाप होता है। परन्तु जब किसी व्यक्ति से कोइ मूमिन गलती से क़त्ल हो गया तो यह भी बहुत बड़ा पाप है परन्तु उस मक़तूल के बदले गलती के कत्ल करने वाले हत्यारे को कत्ल नहीं किया जाएगा। अल्लाह ने उसकी कुछ स्थिति बयान किया है। अल्लाह का फरमान है।

وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ أَن يَقْتُلَ مُؤْمِنًا إِلَّا خَطَأً ۚ وَمَن قَتَلَ مُؤْمِنًا خَطَأً فَتَحْرِ‌يرُ‌ رَ‌قَبَةٍ مُّؤْمِنَةٍ وَدِيَةٌ مُّسَلَّمَةٌ إِلَىٰ أَهْلِهِ إِلَّا أَن يَصَّدَّقُوا ۚ فَإِن كَانَ مِن قَوْمٍ عَدُوٍّ لَّكُمْ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَتَحْرِ‌يرُ‌ رَ‌قَبَةٍ مُّؤْمِنَةٍ ۖ وَإِن كَانَ مِن قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُم مِّيثَاقٌ فَدِيَةٌ مُّسَلَّمَةٌ إِلَىٰ أَهْلِهِ وَتَحْرِ‌يرُ‌ رَ‌قَبَةٍ مُّؤْمِنَةٍ ۖ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَ‌يْنِ مُتَتَابِعَيْنِ تَوْبَةً مِّنَ اللَّـهِ ۗ وَكَانَ اللَّـهُ عَلِيمًا حَكِيمًا.  (سورة النساء: 92

किसी ईमानवाले का यह काम नहीं कि वह किसी ईमानवाले का हत्या करे, सिवाए गलती से हो जाए। और यदि कोई क्यक्ति ग़लती से किसी ईमानवाले की हत्या कर दे, तो एक मोमिन ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा और अर्थदंड उस (मारे गए क्यक्ति) के घरवालों को सौंपा जाए। यह और बात है कि वे अपनी ख़ुशी से छोड़ दें। और यदि वह उन लोगों में से हो, जो तुम्हारे शत्रु हों और वह (मारा जानेवाला) स्वयं मोमिन रहा तो एक मोमिन को ग़ुलामी से आज़ाद करना होगा। और यदि वह उन लोगों में से हो कि तुम्हारे और उनके बीच कोई संधि और समझौता हो, तो अर्थदंड उसके घरवालों को सौंपा जाए और एक मोमिन को ग़ुलामी से आज़ाद करना होगा। लेकिन जो (ग़ुलाम) न पाए तो वह निरन्तर दो मास के रोज़े रखे। यह अल्लाह की ओर से निश्चित किया हुआ है। यही तौबा के स्वीकारित होने का तरीक़ा है। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला,तत्वदर्शी है। (4- सूरह अन्निसाः  92)

इस्लाम धर्म अल्लाह का भेजा हुआ धर्म है। इसी लिए बहुत सारी स्थिति रखी गई ताकि मानव जाति के सब वर्ग के स्थिति के अनुकूल हो।

इसी प्रकार गलत चीज़ों पर कसम खाने या कसम के तोड़ने के पश्चात कसम का कफ्फारा देना चाहिये। जिस के प्रति अल्लाह तआला ने फरमायाः

لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللَّـهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَـٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا عَقَّدتُّمُ الْأَيْمَانَ ۖ فَكَفَّارَ‌تُهُ إِطْعَامُ عَشَرَ‌ةِ مَسَاكِينَ مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِ‌يرُ‌ رَ‌قَبَةٍ ۖ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ ۚ ذَٰلِكَ كَفَّارَ‌ةُ أَيْمَانِكُمْ إِذَا حَلَفْتُمْ ۚ وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّـهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُ‌ونَ. (سورة المائدة: 89)

तुम्हारी उन क़समों पर अल्लाह तुम्हें नहीं पकड़ता जो यूँ ही असावधानी के कारण ज़बान से निकल जाती है। परन्तु जो तुमने पक्की क़समें खाई हों, उनपर वह तुम्हें पकड़ेगा। तो इसका प्रायश्चित दस मुहताजों को औसत दर्जें का खाना खिला देना है, जो तुम अपने बाल-बच्चों को खिलाते हो या फिर उन्हें कपड़े पहनाना या एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा। और जिसे इसकी सामर्थ्य न हो, तो उसे तीन दिन के रोज़े रखने होंगे। यह तुम्हारी क़समों का प्रायश्चित है, जबकि तुम क़सम खा बैठो। तुम अपनी क़समों की हिफ़ाजत किया करो। इस प्रकार अल्लाह अपनी आयतें तुम्हारे सामने खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ। (5-सूरह अलमाइदाः 89)

इसके अलावा भी कुछ स्थितियों में इस्लाम ने दासों और दासियों के आज़ादी पर उभारा है और इसे बहुत ही पुण्य का कार्य बताया है।

इस्लाम ने केवल एक ही स्थिति में गुलाम बनाने की अनुमति दी है और यदि उन्हें क्षमा कर दिया जाए तो अधिक अच्छी बात है। जबकि मुसलमानों और गैर मुस्लिमों के बीच युद्ध हो।

अगर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय में होने वाले युद्धों के प्रति ज्ञान प्राप्त करेंगे तो आप को मालूम होगा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को युद्ध करने पर मजबूर किया गया। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  ने  कभी भी युद्ध का आरम्भ नहीं किया बल्कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के शत्रु ने युद्ध की शुरूआत की। या मदीना पर आक्रमण करने की योजना बना रहे होते थे कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उन पर आक्रमण कर देते थे। उन में से बहुत से युद्धों में रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सब को आजाद कर दिया। प्रत्येक युद्ध से पहले उन्हें इस्लाम की दावत दी जाती।

जिस मक्का वासियों ने मुसलमानों को मारा पीटा तथा कत्ल भी किया और अन्त में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के कत्ल की योजना बना लिया परन्तु अल्लाह तआला अपने रसूल की सुरक्षा किया और जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मदीना की ओर हिजरत कर गए। किन्तु मक्कावासियों ने मुसलमानों को यहाँ भी चैन और सुकून से नहीं रहने दिया और मदीना पर आक्रमण हुए। अतः अल्लाह तआला ने मुसलमानों को विजय दी और मक्का वासियों के 70 व्यक्ति कैदी बनाए गए परन्तु नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कुछ को पैसे ले कर, कुछ को बिना पैसे लिए और कुछ को बच्चों को पढ़ाने के बदले स्वतन्त्र कर दिया।

फतह मक्का के समय नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सब को आजाद कर दिया। इसी प्रकार नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय के विश्व के राजा महाराजा के प्रति इतिहासिक ज्ञान लिया जाए तो स्पष्ट होगा कि सारे राजा महाराजा का नियम यही था कि दुश्मन से युद्ध के बाद प्राजय सेना और उसके समुदाय को दास तथा दासी बना लिया जाता था। इसी प्रकार नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय के इतिहास का अध्ययन करते समय यह भी स्पष्ट होगा कि किसी धर्म या राजा महाराजा ने दासों या दासियों की स्वतन्त्रा के लिए इस कदर या इसका कुछ भी भाग काम न किया है।

मुसलमानों को ही यह प्राथमिक्ता प्राप्त है कि सर्व प्रथम मानव को लोगों की दास्ता से मुक्ति दिलाने के लिए प्रत्येक प्रकार से काम किया। बातों से उत्साहित किया और कर्म कर के अन्जाम दिया और दासी की आज़ादी पर बहुत सी नेकियों का वादा किया।

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