कुरआन क्या है ?

हमने अपने दीन के लिए क्या किया ?

आपने अपनी दीन के लिए क्या कियाआज बातिल पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर चुका है और अपने ज़हरीली विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए हर तरह के संसाधन का प्रयोग कर रहा है, विशेषकर इंटरनेट की दुनिया में फेसबुक, ट्विटर, बलोगज़, यूट्यूब तथा विभिन्न वेबसाइटों द्वारा नफरत को हवा देने में लगा हुआ है, हम मुसलमान होने के नाते जानते हैं कि वे बातिल के प्रचारक हैं, और हम हक़ पर हैं, हम उस धर्म के अनुयायी हैं जिसका अनुसरण लोक में सफलता और प्रलोक की मुक्ति की गारेंटी है। हम उस दीन के मानने वाले हैं जिसके रास्ते में बड़ी-बड़ी कुर्बानियां पेश की गई हैं।

इसी दीन के लिए आदम अलैहिस्सलाम थके थे, नूह अलैहिस्सलाम ने साढ़े नौ सौ साल तक मेहनत की थी, इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में डाला गया था, इस्माइल अलैहिस्सलाम की गर्दन पर चाकू चला था, यूसुफ अलैहिस्सलाम को सस्ते दामों बेचा गया था और वह कुछ सालों तक जेल की सलाखों के पीछे थे, ज़करिया अलैहिस्सलाम को आरी से चीरा गया था, यह्या अलैहिस्सलाम का वध किया गया था, अय्युब अलैहिस्सलाम ने सख्तियाँ झीली थीं, मूसा अलैहिस्सलाम ने बनू इस्राईल के अक्कड़पन को सहन किया था, ईसा अलैहिस्सलाम को सूली पर चढ़ाने के षड़यंत्र किए गए थे, और आख़री नबी हज़रत मुहम्मद अल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लगातार 23 साल तक क़ुरैश की कठिनाइयों को सहन किया था। इसी देन के लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जादूगर, ज्योतिष और पागल कहा गया था, आपके रास्ते में कांटे बिछाए गए थे, आपकी गर्दन मुबारक पर ऊंट की ओझड़ियां डाली गई थीं, पत्थर बरसाया गया था, इसी दीन के लिए आपको घर से बे घर किया गया था, लड़ाईयां लड़ी गई थीं, आपके पवित्र दांत शहीद हुए थे और भूख की शिद्दत से पेट पर पत्थर बांधा था, फिर सहाबा किराम और हर दौर में अल्लाह वालों ने इस दीन के लिए जान और माल की कुर्बानियां पेश कीं, तब जाकर यह दीन हम तक सुरक्षित रूप में पहुंचा है।

इस दीन की सेवा जिन्नात और इनसान तो दूर की बात है दुनिया की सारी सृष्टि कर रही है और अपने अस्तित्व से इस्लाम की शहादत दे रही है। मामूली सा पक्षी हुद-हुद की भूमिका पर विचार कर के देख लीजिए: सुलैमान अलैहिस्सलाम को अल्लाह पाक ने जिन्नात, इनसान और पशु पक्षी सभी पर अधिकार दे रखा था, एक दिन ‘हुद-हुद’ नाम का एक पक्षी उनकी अनुमति के बिना कहीं चला गया, कुछ ही देर गुज़री थी कि आकर उसने यह रिपोर्ट पेश की कि मैं “सबा” के देश से आ रहा हूं जहां की शासक एक महिला है, मैं ने उसे और उसके लोगों को सूर्य की पूजा करते देखा है, शैतान ने उन्हें गुमराह कर रखा है, इसलिए अल्लाह को छोड़ कर सूर्य की पूजा में लगे हुए हैं। फिर सुलैमान अलैहिस्सलाम का निमंत्रण पत्र लेकर “सबा” की रानी की सेवा में पहुंचा, “सबा” की रानी सुलैमान अलैहिस्सलाम से मुलाकात की, अंततः पूरे राष्ट्र के साथ “सबा” की रानी इस्लाम के दामन में पनाह लेती है। इसका वर्णन अल्लाह ने सूरः अन्नमल की आयत 21 से 44 तक में विस्तृत रूप में किया है।

  यह एक पक्षी की भूमिका है, जिसके अंदर शिर्क का दृश्य देखकर ग़ैरत जाग जाती है, फिर सूर्य की पुजारी क़ौम तक अल्लाह का संदेश पहुंचाने के लिए परेशान हो जाता है। हालांकि पक्षियों की यह जिम्मेदारी नहीं है, यह जिम्मेदारी तो हमारी और आपकी है। हमारे अस्तित्व का उद्देश्य ही दूसरों का मार्गदर्शन करना है, हम सबसे अच्छी उम्मत मात्र इसलिए सिद्ध किए गए हैं कि हम भलाई के प्रचारक और दीन के सिपाही हैं। अब हम ज़रा दिल को टटोलें और मन से पूछें कि आख़िर हम अपने दीन के लिए दिन और रात में से कितना समय निकाल पाते हैं, दुनिया के लिए हमारी जो योजनायें होती हैं उसका कितना हिस्सा हम दीन को दे रहे हैं। क्या यह सच्चाई नहीं कि आज हमारी बहुमत सुबह से लेकर शाम तक सांसारिक जीवन की आवश्यकताओं में लगी रहती है, हम दीन की सेवा के लिए सौ बहाने बनाते हैं, हम कल क़यामत के दिन अपने अल्लाह के सामने क्या जवाब देंगे जब वह हम से उन लोगों के बारे में पूछेगा जिन तक दीन न पहुंच सका था, या वही लोग हमारी गर्दन पकड़ कर अल्लाह के दरबार में पेश करेंगे कि हे अल्लाह! इसने हम तक सच्चाई नहीं पहुँचाई थी…उस समय हमारा क्या जवाब होगा? कौन सा चेहरा लेकर अपने नबी से रूबरू हो सकेंगे जिनका 23 वर्षीय जीवन इस दीन के लिए समर्पित था …?

तो फिर सुस्ती कब तक और गफलत क्यों कर, साहस कीजिए,  हर प्रकार के मतभेद में ऊपर उठ कर दीन का काम शुरू कर दीजिए, बेकार के कामों में लग कर ज्ञान का शोषण न करें, वरीयताओं को सामने रखते हुए आगे बढ़ें, करने के काम बहुत हैं, हम नहीं जानते कि अल्लाह किस से कौन सा काम ले ले, इसलिए खुद को उपेक्षित न समझें, आप अपनी ज़ात में एक संगठन हैं, मुस्लिम समुदाय को आपकी सख्त जरूरत है, आप दीन के लिए जो भी सेवा प्रदान कर सकते हैं पहली फुरसत में इसके लिए खुद को तैयार करें, क्या आपको इस खबर पर आश्चर्य नहीं है कि जर्मन के म्यूनिख शहर में एक युवक ने कार के पहियों का बड़ा विज्ञापन बोर्ड देखा जिस पर लिखा गया था: “आप यूकोहामा टायर को नहीं जानते…। ”! इस मुस्लिम युवक ने उसी घोषणा के बाज़ू में कीमत दे कर यह एलान प्रकाशित कराया:

  “आप इस्लाम को नहीं जानते…। अगर जानने के इच्छुक हैं तो इस नंबर पर संपर्क करें…। “

फिर क्या था हर तरफ़ से उसे फोन आने लगा, और केवल एक वर्ष में एक हज़ार पुरुष एवं स्त्री ने उसके हाथ पर इस्लाम स्वीकार किया। यह देखकर समृद्ध लोगों ने उसकी सेवा में वित्तीय सहयोग प्रस्तुत किया जिस से उसने एक मस्जिद बनाई, दावती केंद्र स्थापित किया  शिक्ष-स्थल का निर्माण किया।

आइए! हम भी आपको एक दावती टूल देते हैं, यदि संभव हो तो अपनी निजी कार पर यह घोषणा लगयें: “आप इस्लाम को नहीं जानते….यदि जानना चाहते हैं तो हमें रोकने में झिझक महसूस न करें” फिर देखें इसका क्या प्रभाव पड़ता है, यदि आप दाई के रूप में खुद को पेश नहीं कर सकते तो कम से कम दावती पैकेज वितरित करने में हमारा साथ तो दे सकते हैं, यहाँ तक कि यह लेख जिसे अभी आप पढ़ रहे हैं इसे  पढ़ने के बाद दूसरों तक शियर करने का कष्ट करें,  कल्पना कीजिए कि अगर एक लेख द्वारा अल्लाह पाक ने किसी को हिदायत दे दी तो आपके लिए यह प्रक्रिया दुनिया और उसकी प्रत्येक चीज़ों से अच्छी होगी। इस लिए हर प्रकार के बाधे को तोड़ते हुए दीन की सेवा के लिए हमारा साथ दीजिए। हमें आपकी टिप्पणी की शिद्दत से प्रतिक्षा रहेगी।

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