कुरआन क्या है ?

मजदूरों के अधिकार

इस्लाम ने मजदूरों के अधिकार को अदा करने पर उत्साहित किया है।

इस्लाम ने मजदूरों के अधिकार को अदा करने पर उत्साहित किया है।

इस्लाम बहुत ही न्याय पर आधारित धर्म है, जो समाज में पाये जाने वाले किसी भी वर्ग के लिए अत्याचार को पसन्द नहीं करता और प्रत्येक लोग और समाज को अपनी अपनी ज़िम्मेदारी बहुत उत्तम रूप से अन्जाम देने पर उत्साहित करता है और आखिरत में अच्छा बदला देने का वादा किया है। उन्हीं आदेशों और अधिकारों में मजदूरों का अधिकार और हुक़ूक़ है। अल्लाह तआला ने काम कराने वाले मालिक और काम करने वाले मजदूर को अपने अपने स्थान पर ज़िम्मेदार बनाया है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी को अच्छे तरीके से अन्जाम दे। क्योंकि प्रत्येक को उसकी ज़िम्मेदारी के प्रति प्रश्न किया जाएगा। जैसाकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमयाः

ألا كُلّكُم راعٍ وكلّكُم مسئولٌ عن رعيّتهِ.  فالأميرُ الذي على الناسِ راعٍ، وهو مسئولٌ عن رعيّتهِ. والرجلُ راعٍ على أهلِ بيتهِ، وهو مسئولٌ عنهم. والمرأةُ راعيةٌ على بيت بعلِها وولدهِ، وهيَ مسئُولَةٌ عنهُم. والعبدُ راعٍ على مالِ سيّدِهِ، وهو مسئُولٌ عنهُ. ألا فكلُّكُم راعٍ.وكلكُم مسئولٌ عن رعيتهِ.  (صحيح مسلم: 1829

सुन लोः तुम में से हर व्यक्ति ज़िम्मेदार है और प्रत्येक से उनकी ज़िम्मेदारी के प्रति प्रश्न किया जाएगा। तो लोगों का शासक ज़िम्मेदार है और उसकी ज़िम्मेदारी के प्रति प्रश्न किया जाएगा। व्यक्ति अपने परिवार का ज़िम्मेदार है और उसकी ज़िम्मेदारी के प्रति उस से प्रश्न किया जाएगा। महिला अपने पति के घर और उसके बच्चों की ज़िम्मेदार है और उस से उसकी ज़िम्मेदारी के प्रति प्रश्न किया जाएगा। और सेवक (मजदूर) अपने मालिक के माल का ज़िम्मेदार है और उस से उसकी ज़िम्मेदारी के प्रति प्रश्न किया जाएगा। तो सुन लोः तुम में से हर व्यक्ति ज़िम्मेदार है और प्रत्येक से उनकी ज़िम्मेदारी के प्रति प्रश्न किया जाएगा। (सही मुस्लिमः 1829)

इल लिए मालिक और मजदूर दोनों अपनी अपनी ज़िम्मेदीर के प्रति चौकन्ना रहें और कोई भी किसी पर किसी प्रकार का अत्याचार और ज़ुल्म न करे। क्योंकि अत्याचार और ज़ुल्म के प्रति बहुत ही सख्त प्रकार का प्रश्न किया जाएगा।

अल्लाह तआला ने ज़ुल्म और अत्याचार से मना फरमाया है। जैसाकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हदीस क़ुद्सी वर्णन करते हैं कि अल्लाह का फरमान हैः

عن النبيِّ صلَّى اللهُ عليهِ وسلَّمَ، فيما روى عن اللهِ تبارك وتعالى أنَّهُ قال: ياعبادي! إني حرَّمتُ الظلمَ على نفسي وجعلتُه بينكم محرَّمًا. فلا تظَّالموا .( صحيح مسلم: 2577

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह तआला से वर्णन किया कि अल्लाह तबारक व तआला ने फरमायाः ऐ मेरे भक्तों! मैं ने अत्याचार को अपने ऊपर वर्जित कर दिया हूँ और तुम्हारे बीच भी अत्याचार को वर्जित कर दिया हूँ, तो तुम एक दुसरे पर अत्याचार न करो …… (सही मुस्लिमः 2577)

बल्कि अल्लाह तआला अत्याचारक व्यक्तियों को ढील देता है और फिर उसे सख्त यातनाओं में ग्रस्त करता है। जैसाकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सुचित किया हैः

बेशक अल्लाह अत्याचारक को ढील देता है, परन्तु जब उसी पकड़ करता है तो फिर उसे छूट नहीं देता है। फिर यह आयत तिलावत कीः तेरे रब की पकड़ ऐसी ही होती है, जब वह किसी ज़ालिम बस्ती को पकड़ता है। निस्संदेह उसकी पकड़ बड़ी दुखद, अत्यन्त कठोर होती है।(सूरहहूदः102)-)सही बुखारीः 4686)

बल्कि अल्लाह ने अत्याचार करने वाले गाँव वासियों को बर्बाद कर दया और उन लोगों की बर्बादी का मुख्य कारण दुसरे पर अत्याचार करना ही था। जैसा कि अल्लाह ने सुचित किया हैः

وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا الْقُرُ‌ونَ مِن قَبْلِكُمْ لَمَّا ظَلَمُوا. (سوره يونس: 13

तुमसे पहले कितनी ही नस्लों को, जब उन्हों ने अत्याचार किया, हम विनष्ट कर चुके है। (सूरह युनूसः 13)

इस के अलावा भी बहुत सी आयतों में अल्लाह ने अत्यचारक समुदाय तथा व्यक्तियों के विनाश के प्रति सुचित किया है और अत्यचार करने वालों का कोई अल्लाह के पास सहायक नहीं होगा।

चूंकि मजदूर और उसका मालिक प्रत्येक एक दुसरे पर अत्याचार करते हैं, तो जो कोई भी अत्याचार करेगा, उसे अपने ज़ुल्म के प्रति जवाब देना होगा।

परन्तु अधिकतम यही देखा गया है कि मालिक अपने मजदूरों पर अत्याचार करते हैं, काम कराने के बाद उसका अधिकार नहीं देते, संधि से अधिक काम लेते हैं, या काम की सही मजदूरी नहीं देते हैं। तो ऐसे लोगों को अल्लाह से डरना चाहिये। क्योंकि अत्याचारक को अल्लाह दुनिया और आखिरत में अपमान करता है।

अल्लाह ने मजदूरों के स्थान को ऊंचा किया है और उसे भी आदर-सम्मान से सुसज्जित किया है और मजदूरों के अधिकारऔर उन के हुक़ूक को मालिकों पर अनिवार्य किया है। जिसे अदा करना फर्ज़ है।

निम्न में मजदूरों के कुछ अधिकार संछिप्त में बयान किया जाता हैः

(1)  मजदूरों से संधि तै करते समय उन्हें परेशानी और कष्ट में न डाला जाएः

जब मजदूर और मालिक के बीच काम और मजदूरी या सेलरी और वेतन के प्रति संधि तै की जा रही हो, तो संधि में किसी के साथ अत्याचार न किया जाए। बल्कि ऐसी संधि तैयार की जाए जो दोनों पक्ष की स्थिति के अनूकुल हो, दोनों पक्ष में से किसी एक पक्ष के परेशानी और कष्ट का कारण न हो। जैसा क़ुरआन में अल्लाह तआला शुऐब और मूसा (अलैहिमुस्सलाम) के किस्से के तहत बयान किया है। जब शुऐब (अलैहिस्सलाम) ने मामला तै करते हुए मूसा (अलैहिस्सलाम) से कहा, जिसे क़ुरआन में इस प्रकार बयान किया गया है।

وَمَا أُرِ‌يدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ ۚ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّـهُ مِنَ الصَّالِحِينَ. (سورة القصص: 27

” मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता। यदि अल्लाह ने चाहा, तो तुम मुझे नेक पाओगे।” (सूरह अल्कससः 27)

शुऐब (अलैहिस्सलाम) मालिक थे और मूसा (अलैहिस्सलाम) खादिम और सेवक थे, परन्तु शुऐब(अलैहिस्सलाम) ने मूसा (अलैहिस्सलाम) से स्पष्ट रूप में कहा कि मैं तुम पर सख्ती और कठिनाइ नहीं करना चाहता और मुझे अल्लाह को खुश करने वाला पाओगे। यदि इस युग में भी मालिक और खादिम दोनों अपनी अपनी जिम्मेदारियों में अल्लाह की प्रसन्नता का ख्याल रखें, बेशक कोइ किसी पर तनिक भी अत्याचार नहीं करेगा।

(2)  मजदूरों के आदर-सम्मान का पूरा ख्याल करना चाहियेः

अल्लाह ने किसी को इस दुनिया में पैसा वाला और दुनिवा की सामग्री का मालिक बनाया है या उन्हें अच्छा स्थान और पोस्ट दिया है। तो वह अपने अधिकारियों या कामगारों के साथ दूर्व्यवहार से पेश न आए और नहीं उन्हें अपमान करे औरन ही उन्हें बात बात पर बुरा भला कहे या अपमानजनक व्यवहार से पेश न आए। बल्कि उनके आयु और स्थान के अनुसार आदर-सम्मान करे। क्योंकि अल्लाह किसी को किसी पर किसी कारण से सर्वश्रेष्टा देता है, तो दुसरे को किसी दुसरी कारण से सर्वश्रेष्टा देता है। यदि मालिक पैसे के अनुसार बड़ा स्थान वाला है, परन्तु कामगार अल्लाह के पास धर्म पर अमल के अनुसार बड़ा स्थान वाला हो सकता है। रसूल (सल्ल) के इस कथन पर विचार करें।

عن سهل بن سعد الساعدي رضي الله عنهقال: مرَّ رجلٌ على رسولِ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم، فقال لرجلٍ عِندَه جالسٌ: ما رأيُك في هذا. فقال:رجلٌ من أشرافِ الناسِ، هذا واللهِ حرِيٌّ إن خطَب أن يُنكَحَ، وإن شفَع أن يُشَفَّعَ، قال: فسكَت رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم ثم مرَّ رجلٌ، فقال له رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم: ما رأيُك في هذا. فقال: يا رسولَ اللهِ! هذا رجلٌ من فُقَراءِ المسلمينَ، هذا حَرِيٌّ إن خطَب أن لا يُنكَحَ، وإن شفَع أن لا يُشَفَّعَ، وإن قال أن لا يُسمَعَ لقولِه، فقال رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم: هذا خيرٌ من مِلءِ الأرضِ مثلِ هذا. (صحيح البخاري: 6447

सहल बिन सअद अस्साइदी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन हैः एक व्यक्ति रसूल (सल्ल) के पास से गुजरा तो रसूल (सल्ल) ने अपने पास बैठे एक व्यक्ति से प्रश्न कियाः इस व्यक्ति के प्रति तुम क्या कहते हो, तो उस व्यक्ति ने उत्तर दियाः प्रतिष्टित लोगों में से है, अल्लाह की कसमः यदि किसी को शादी का पैगाम दे, तो शादी के पैगाम को स्वीकार कर लिया जाए, और यदि किसी से किसी शिफारिस करे तो उस की शिफारिस स्वीकारित हो। तो रसूल (सल्ल) खामूश हो गए। फिर एक व्यक्ति गुजरा तो तो रसूल (सल्ल) ने अपने पास बैठे उसी व्यक्ति से प्रश्न कियाः इस व्यक्ति के प्रति तुम क्या कहते हो, तो उस व्यक्ति ने उत्तर दियाः ऐ अल्लाह के रसूलः गरीब लोगों में से है, यदि किसी को शादी का पैगाम दे, तो शादी का पैगाम अस्वीकारित हो, और यदि किसी से किसी शिफारिस करे तो उस की शिफारिस अस्वीकारित हो और कोइ बात कहे तो उसकी बात न मानी जाए। तो आप (सल्ल) ने फरमायाः यह व्यक्ति धरती के बराबर धनि लोगों से उत्तम है। (सही बुखारीः 6447)

(3)  मजदूरों के साथ उत्तम व्यवहार और सदस्भाव से पेश आना चाहियेः

मानव पारस्परस उत्तम व्यवहार करना चाहिये, क्योंकि इस उत्तम व्यवहार का पुण्य बहुत है और नबी (सल्ल) सब के साथ उत्तम व्यवहार से पेश आते थे, नबी (सल्ल) की जीवन हमारे लिए उत्तम आदर्श है। नबी (सल्ल) का अपने सेवकों के साथ उत्तम व्यवहार का एक दृश्य आप की सेवा में प्रस्तुत करते हैं।

كان رسول الله من أحسن النَّاس خُلقًا، فأرسلني يومًا لحاجةٍ، فقلت: والله لا أذهب -وفي نفسي أن أذهب لما أمرني به نبيُّ الله – قال: فخرجت حتى أَمُرَّ على صبيانٍ وهم يلعبون في السُّوق، فإذا رسول الله قابضٌ بقفاي من ورائي، فنظرت إليه وهو يضحك، فقال: “يَا أُنَيْسُ، اذْهَبْ حَيْثُ أَمَرْتُكَ”.قلت: نعم، أنا أذهب يا رسول الله. قال أنس: وَاللهِ لَقَدْ خَدَمْتُهُ سَبْعَ سِنِينَ أَوْ تِسْعَ سِنِينَ مَا عَلِمْتُ قَالَ لِشَيْءٍ صَنَعْتُ:لِمَ فَعَلْتَ كَذَا وَكَذَا؟ وَلاَ لِشَيْءٍ تَرَكْتُ: هَلاَّ فَعَلْتَ كَذَا وَكَذَا. (مسلم: كتاب الفضائل، باب كان رسول الله أحسن الناس خُلُقًا – 2310

अनस (रज़ि) कहते हैः नबी )सल्ल(सर्व लोगों में सब से अधिक उत्तम आचार वाले थे। तो एक दिन मुझे किसी काम से भेजा, तो मैं ने कहाः मैं नहीं जाऊंगा, परन्तु मेरे हृदय में था कि जहां नबी (सल्ल) भेज रहें हैं, मैं ज़रूर जाऊंगा, तो अनस (रज़ि) कहते हैः मैं वहां से निकाला, तो रास्ते में बच्चे खेल रहे थे, तो मैं भी उन के साथ खेलने लगा, तो रसूल (सल्ल) आ कर मेरे पीछे से सर को पकड़ लिया, तो मैं पीछे मुड़ कर देखा तो आप (सल्ल) हंस रहे थे, और फरमायाः ऐ उनैस! जिस काम के करने का आदेश दिया हूँ, वह काम कर आओ, तो मैं ने कहाः जी हाँ, ऐ अल्लाह के रसूलः अनस कहते हैं, मैं ने रसूल (सल्ल) की सात या नौ वर्ष तक की सेवा की, तो कभी भी मुझे किसी काम के करने पर यह नहीं कहा, तुम ने ऐसा ऐसा क्यों किया और न ही किसी काम को छोड़ दिया तो कहा, तुम ने ऐसा ऐसा क्यों नहीं किया। (सही मुस्लिमः 2310)

नबी (सल्ल) प्रत्येक व्यक्ति के साथ अच्छे आचार से पेश आते थे, चाहे सेवक ही क्यों न हो। ताकि सेवक के आदर-सम्मान में किसी प्रकार की कमी न आए।

(4)  मजदूरों को इस्लामी आदेशों पर अमल करने से न रोका जाएः

मजदूरों को इस्लामी अनिवार्य कार्य और इबादतों पर अमल करने से मना न किया जाए, बल्कि उन्हें इबादतों के करने पर उत्साहित किया जाए और इबादतों की अदाएगी सरल बनाया जाए। क्योंकि अल्लाह के आदेश के अनुसरण में बाधा डालने वालों को अल्लाह ने खुली चेतावनी दी है।

الَّذِينَ يَسْتَحِبُّونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَاعَلَى الْآخِرَ‌ةِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّـهِ وَيَبْغُونَهَاعِوَجًا ۚ أُولَـٰئِكَ فِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ. (سورة ابراهيم: 3

जोआख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हैं और अल्लाह केमार्ग से रोकते हैं और उस में टेढ़ पैदा करना चाहते हैं, यही लोग परले दरजे कीगुमराही में पड़े हैं। (सूरह इबराहीमः 3)

इस आयत में अल्लाह तआला ने अल्लाह के रास्ते में बाधा डालने वालों पदभ्रष्टों में शुमार किया है।

(5)  मजदूरों से उनकी शक्ति से अधिक काम न लिया जाएः

मजदूरों से उनकी शारीरिक शक्ति से अधिक काम लेना अवैध है। अगर किसी विशेष कारण से अधिक काम लेना ज़रूरी हो, तो उसकी सहायाता की जाए। इसी प्रकार संधि से अधिक से काम लेना भी नाजाइज़ है और यदि संधि से अधिक काम लिया गया तो उकी अलग से मजदूरी दी जाए। रसूल (सल्ल) ने कामगार व्यक्तियों के अधिकार के सुरक्षित करते हुए फरमायाः

   عن المعرور بن سويد قال:رأيت أبا ذَرٍّ الغِفَارِيَّ رضي الله عنه، وعليه حُلَّةٌ، وعلى غلامه حُلَّةٌ، فسألناهُ عن ذلك، فقال: إني سَابَبْتُ رجلًا، فشكاني إلى النبيِّ صلَّى اللهُ عليه وسلَّم، فقال لي النبي صلَّى اللهُ عليه وسلَّم: أعَيَّرْتَهُ بأُمِّهِ. ثم قال:إن إخوانَكمخَوَلُكم جعلهمُ اللَّهُ تحتَ أيديكُم، فمنْ كان أخوهُ تحتَ يَدِهِ، فليُطْعِمهُ مما يأكلُ، وليُلبِسهُ مما يَلبَسُ، ولا تُكَلِّفوهم ما يَغْلِبُهُم، فإنْ كَلَّفْتُموهم ما يَغْلِبُهم فأعينوهم. (صحيح البخاري: 2545

मअरूर बिन सुवैद कहते हैं कि मैं ने अबू ज़र अल्-गफ्फारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके दास को एक जैसा कपड़ा पहने हुए देखा, तो मैं ने इसका कारण पूंछा, तो उन्हें ने उत्तर दियाः मैं ने एक व्यक्ति को उसके माँ के प्रति शर्म दिलायाः तो उस व्यक्ति ने इस बात की शिकायत रसूल (सल्ल) से किया, तो आप (सल्ल) ने फरमायाः क्या तुम ने उसे उसकी माँ के प्रति शर्म दिलाया ?, फिर फरमायाः बेशक तुम्हारा खादिम तुम्हारा भाई है। अल्लाह ने उन्हें तुम्हारे मातहत बनाया है। जिस के मातहत उसका भाई है, तो उसे वही खिलाए जो स्वयं खाए और उसे वही पहनाए जो स्वयं पहने और उन्हें उन्की क्षमता से अधिक काम न दे, यदि उन्हें उनकी क्षमता से अधिक काम देना ज़रूरी हो, तो फिर उस काम के पूर्ति में उसकी सहायता की जाए। (सहीहुल बुखारीः 2545)

इस्लामी शिक्षा भी यही है कि मजदूरों के क्षमता से अधिक काम न लिया जाए। अगर संधि से अधिक काम लिया गया, तो उसकी मजदूरी अलग से दी जाए। या काम की पूर्ति में मदद की जाए।

(6)  मजदूरों को पीटना या उन्हें बात बात पर गाली देना या बुरा भला कहना भी पाप हैः

मजदूर भी मानव होता है, जिस से गलती और भूल चूक हो जाती है। जिस की गलती और भूलचूक को माफ कर देना चाहिये, उसे बुरा भला नहीं कहना चाहिये, बल्कि उसे क्षमा कर देना चाहिये। जैसा कि रसूल (रसूल) से एक व्यक्ति ने प्रश्न किया।

एक व्यक्ति नबी (सल्ल) की सेवा में उपस्थित हुआ और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! सेवक की कितनी गलती माफ करूँ ?, तो अल्लाह के रसूल (सल्ल) खामूश रहे, तो उस व्यक्ति ने फिर प्रश्न कियाः ऐ अल्लाह के रसूल! सेवक की कितनी गलती माफ करूँ?, तो आप ने फरमायाः प्रति दिन सत्तर बार। (सही तिर्रिमिज़ीः 1949)

जो व्यक्ति अपने खादिम या कामगार को गाली देगा या पीटेगा या बहुत पीड़ा देगा, तो उसे बहुत पाप प्राप्त होगा और अपने अत्याचर के अनुसार पाप का बदला प्राप्त करेगा, यही भी संभव है कि अपने मातहत पर ज़ुल्म करने के कारण जहन्नम में दाखिल होगा। इस हदीस पर विचार करें।

अबू मस्ऊद (रज़ि) कहते हैः मैं अपने एक दास को पीट रहा था, पीछे से एक आवाज़ आई। अबू मस्ऊद! होश्यार हो जाओ, अल्लाह तआला तुम से तुम पर उस से अधिक शक्तिशाली है, तो मैं पीछे पलट कर देखा, तो आप (सल्ल) थे। तो मैं ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं ने अल्लाह की खुशी के लिए उसे स्वतन्त्र कर दिया, तो आप ने फरमयाः यदि तुम उसे स्वतन्त्र नहीं करते, तो तुम नरक में प्रवेश होते। (सही मुस्लिमः 1659)

इस हदीस में स्पष्ट रूप से पीटने वाले सहाबी को खुली चेतावनी दी गई कि तुम यदि उसे स्वतन्त्र नहीं करते तो अपने अत्याचार करने के कारण तुम नरक में दाखिल होते।

(7)  मजदूरों के कामों में आसानी उत्पन्न करने वालों के पुण्य के तराज़ू को अल्लाह तआला क़ियामत के दिन भारी करेगाः

जो व्यक्ति अपने सेवकों तथा कामगारों से उनकी क्षमता के अनुसार काम करवाता है और ज़्यादा परेशानी वाला कार्य नहीं करवाता, इसी प्रकार वह कार्य नहीं करवाता जो उनकी स्वस्थ के लिए हाणिकारण हो, तो अल्लाह तआला ऐसे व्यक्तियों के कर्मपत्र को क़ियामत के दिन भारी करवाएगा।

जैसा कि रसूल (सल्ल) ने फरमायाः

जो कुछ तुम्ने अपने सेवकों के काम में कमी किया, तो वह तुम्हारे लिए क़ियामत के दिन तुम्हारे कर्मपत्र में ज्यादा शुमार किया जाएगा। (अल-जामिअ अस्सगीरः 7899 व इब्ने हब्बानः 4314)

(8)  मजदूर को तुरन्त उसकी मजदूरी दी जाएः

जब मजदूर काम कर ले, तो उसे बिना किसी टाल मटोल उसकी मजदूरी दी जाए। जैसाकि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः  कामगार को उसकी मजदूरी उसका पसीना सुखने से पहले दे दो।   (सही इब्ने माजाः 1995)

(9) मजदूर की मजदूरी हड़प करने वालों के लिए सख्त सजा की घोषणाः

जिस ने भी मजदूर का अधिकार न दिया, उस की मजदूरी में कमी की या ना जाइज तरीके से उसका हक्क खा लिया, उसके वेतन के अदा करने में टाल मटोल न किया जाए बल्कि काम खत्म होने या महीना पूरा होने के तुरन्त बाद अदा कर दिया जाए। क्योंकि क़ियामत के दिन अल्लाह तआला मजदूर की ओर से अत्याचारक के विरोध होगा।

قال رسول الله في الحديث القدسي عن ربِّ العزَّة ، قَالَ اللَّهُ تَعَالَى: ثلاثةٌ أنا خصمهم يومَ القيامةِ: رجلٌ أعطى بي ثم غدرَ، ورجلٌ باع حرًّا فأكل ثمنَه ، ورجلٌ استأجرَ أجيرًا فاستوفى منهُ ولم يُعْطِه أجرَه. صحيح البخاري: 2227

रसूल (सल्ल) हदीस क़ुद्सी में अपने रब्ब से हदीस वर्णन करते है कि अल्लाह तआला ने फरमायाः क़ियामत के दिन मैं तीन लोगों का विरोधी रहूंगा, एक व्यक्तिः जिस ने मेरा वास्ता दिया और फिर धोखा दिया, दुसराः जिसने किसी स्वतन्त्र व्यक्ति को बैच कर उसका लाभ खाया और तीसराः व्यक्ति जिसने किसी मजदूर को मजदूरी पर रखा और फिर उस से पूरा काम करवाया और उसकी मजदूरी नहीं अदा किया। (सही बुखारीः 2227)

बल्कि जो व्यक्ति भी किसी का हक्क नाहक्क तरीके से खाएगा, चाहे वह मालिक हो या मजदूर या आस पड़ोस के लोग हो, तो वह अपने लिए जहन्नम को खरीद रहे हैं और अपने आप को जन्नत से दूर कर रहे हैं। इस हदीस पर विचार करें, जिस में रसूल (सल्ल) ने स्पष्ट रूप से दुसरे के अधिकार और हुकूक को हड़प कर लेने से मना फरमाया है। रसूल (सल्ल) का फरमान है।

قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: مَنِ اقْتَطَعَ حَقَّ امْرِئٍ مُسْلِمٍ بِيَمِينِهِ فَقَدْ أَوْجَبَ اللَّهُ لَهُ النَّارَ، وَحَرَّمَ عَلَيْهِ الْجَنَّة. فقال رجل: وإن كان شيئًا يسيرًا يا رسول الله؟ فقال: وَإِنْ قَضِيبًا مِنْ أَرَاك.   (مسلم:137)، وسنن النسائي (5419)، ومسند أحمد -22293.

अबू उमामा अल्बाहिली (रज़ि) से वर्णन है कि रसूल (सल्ल) ने फरमायाः जिसने किसी मुसलमान व्यक्ति का हक्क कसम के माध्यम से हड़प कर लिया तो अल्लाह उसके लिए जहन्नम को अनिवार्य कर देता है और जन्नत को उस के लिए वंचित कर देता है। तो एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! यदि वह मामूली वस्तु ही क्यों न हो? तो रसूल (सल्ल) ने फरमायाः अगर्चे कि वह मिस्वाक का एक टुकड़ा ही क्यों न हो। (सही मुस्लिमः 137, व सुनन नसईः 5419, व मुस्नद अहमदः 22293)

इस हदीस पर गम्भीरता से विचार करें कि नबी (सल्ल) ने बिना अनुमति के दुसरे व्यक्ति का मिस्वाक के जैसी कोइ मामूली वस्तु ना हक्क तरीके से लेने से मना किया है और ऐसा करने वाला व्यक्ति जहन्नम में सुनिश्चित जाएगा और जन्नत जैसी महान पुरस्कार से वंचित रहेगा। इस से अनुमान करें कि दुसरे व्यक्ति की मामूली चीज हड़प करना कितना बड़ा पाप है कि मानव उस कारण जहन्नम में प्रवेश होगा और जन्नत से महरूम हो जाएगा।

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