कुरआन क्या है ?

नव मुस्लिम हेतू 8 उपदेश

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हर नव-मुस्लिम के लिए इस्लाम स्वीकार करने के बाद निम्नलिखित 8 उपदेशों पर ध्यान देना अति आवश्यक है ताकि उनके जीवन में बदलाव आ सके और संकट के समय इस्लाम पर डटे रहने में सहायक सिद्ध हों।

इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व सब से प्रथम प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि हम क्यों इस्लाम स्वीकार करें? क्या इस लिए कि लोग हमारी प्रशंसा करेंगे, अथवा इस लिए कि हमें कोई सांसारिक लाभ प्राप्त होने वाला है?

नहीं और कदापि नहीं ! हम मात्र एक अल्लाह का परिचय प्राप्त करने के बाद ही इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं ताकि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर अल्लाह की शरण लें और दुनिया और पारलोकिक जीवन में सफलता प्राप्त करें, तो इन 8 उपदेशों पर अमल करें, निःसंदेह अल्लाह तआला आप की जीवन में हर्ष तथा सफलता प्रदान करेगा।

 

 (1)   लोगों को इस्लाम की ओर निमंत्रण करें:

संसारिक प्रत्येक वस्तु स्थाई है और मृत्यु का स्वाद हर जीवधारी को चखना है और हर मानव को मृत्यु के बाद अल्लाह के समक्ष प्रत्येक कर्मों का हिसाब देना है। यही कारण है कि मानव दुनिया में जो भी पुण्य का कार्य करता है, वही उस के लिए लाभदायक होगा, इस्लाम की ओर निमंत्रण करना भी बहुत ही पुण्य का काम है। अल्लाह तआला ने इसी की ओर मानव को उत्साहित किया है। ” और उस व्यक्ति की बात से अच्छी बात और किसकी होगी जिसने अल्लाह की ओर बुलाया और अच्छा कर्म किया और कहा, मैं मुसलमान (आज्ञाकारी) हूँ ” (सूरः फुस्सिलत-33)

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः ” यदि अल्लाह तआला ने आप के माध्यम से एक व्यक्ति को सही मार्ग दिखा दे तो यह आप के लिए दुनिया एवं दुनिया की सम्पूर्ण वस्तुओं से उत्तम है।”

आप स्थिति के अनुसार अपने इस्लाम स्वीकार करने की घोषणा करें, यदि ज़्यादा क्षति का भय न हो तो सब लोगों को बता दें, या आप अपने इस्लाम को गुप्त रखें, नमाज़ तथा दुसरी इबादतें करते रहें और जैसे ही उचित समय मिले अपने मुस्लिम होने का इलान कर दें, किसी से न डरें बल्कि अल्लाह से दुआ करते हुए अल्लाह पर भरोसा रखें, अल्लाह की सहायता और मदद आप के साथ होगी, आप अपने घर वालों, पड़ोसियों, साथ में काम करने वालों, मित्रों, रूम में रहने वाले लोगों, इत्यादि को अच्छे ढंग तथा सुन्दर तरीक़े से इस्लाम की ओर निमंत्रण करें, अपने सुन्दर स्वभाव से लोगों को प्रभावित करें, मीठी बातों से लोगों का दिल जीतें, इस्लामिक पुस्तकें दें, अल्लाह की महानता बयान करें, इस्लाम की मूल शिक्षा का प्रचार करें और अल्लाह तआला से ही इन पुण्य कार्यों के बदले की आशा रखें, बेशक आप की प्रत्येक कोशिश का पुरस्कार अल्लाह के पास सुरक्षित रहेगा, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यही वादा फरमाया है।” जिस ने किसी को अच्छी चीज़ों और भलाइ की ओर निमंत्रण किया तो उसे भलाई करने वाले के बराबर सवाब (पुण्य) मिलेगा।” (सही मुस्लिम)

 

(2)    पढ़ें:

एक मानव के लिए ज्ञान बहुत ही महत्वपूर्ण है जो उसे सत्य तथा असत्य के बीच अन्तर करने की क्षमता प्रदान करता है। ज्ञानि व्यक्ति, अज्ञानि व्यक्ति से उत्तम होता है। इसी कारण तो अल्लाह तआला ने मुसलमानों को सब से पहले पढ़ने का आदेश दिया है। क़ुरआन की सब से प्रथम आयत में अल्लाह तआला ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को पढ़ने से आरंभ कर के प्रत्येक नव मुस्लिम को अधिक से अधिकतम पढ़ने का निर्देशन दिया है।

(1) सब से पहले धर्म की मूल शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करें। पवित्रता, नमाज़ों और इबादतों का ज्ञान लेना अनिवार्य है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की आदर्श जीवनी का अध्ययन अवश्य करें और पूर्ण नबियों की जीवन कथा पढ़ें ताकि आप का अल्लाह पर ईमान अधिक से अधिकतम होजाए।

(2) क़ुरआन पढ़ें, हो सके तो प्रति दिन एक एक आयत याद करें, सूरः फातिह़ा को सब से पहले याद कर लें, कम से कम दस मिनट प्रति दिन अनुवादित क़ुरआन पढ़ें। यदि क़ुरआन नहीं पढ़ सकते तो क़ुरआन और अनुवादित क़ुरआन सुनें।

(3) अरबी भाषा सिखें। क्योंकि क़ुरआन और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की कही हुई बातों को सही तरीके से समझने के लिए अरबिक भाषा का जानना ज़रूरी है। क़ुरआन पढ़ कर हृदय को बहुत शान्ति प्राप्त होती है। जब आप अरबिक पढ़ना लिखना नहीं जानेंगे तो बहुत से पुण्य से वंचित रहेंगे। इस लिए प्रयास करें कि जल्द से जल्द से अरबिक पढ़ना लिखना सिख लें। आप अपने प्रत्येक प्रयास पर अल्लाह से नेकी की आशा रखें क्योंकि नियतों के अनुसार अल्लाह तआला पुण्य देता है।

 

(3)    मस्जिद:

मस्जिद वह पवित्र स्थान है जहाँ केवल एक अल्लाह की इबादत का आदेश है। जिस में दिन और रात में पाँच बार सब लोगों के साथ मिल कर नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है। जहाँ बैठ कर क़ुरआन करीम की तिलावत की जाए, ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह का ज़िक्र किया जाए। जिस के कारण हृदय को शान्ति मिलती है। दीनी भाईचारगी बढ़ती है और जन्नत का रास्ता सरल कर देता है जैसा कि अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः ” जो मस्जिद की ओर जल्द ही निकला तो अल्लाह उस के लिए जन्नत में एक घर बनाएगा और जब जब वह मस्जिद की ओर निकलेगा”। ( सही बुखारी तथा सही मुस्लिम)

यदि आप का घर मस्जिद से बहुत दूर है तो कम से कम एक समय की नमाज़ मस्जिद में जा कर अवश्य पढ़ें।

इसी तरह अपने घर या रूम में यदि संभव हो तो नमाज़ पढ़ने के लिए स्थान नियुक्त कर लें ताकि वहाँ बैठ कर नमाज़ तथा केवल अल्लाह का ज़िक्र किया जा सके।

 

 (4)    नेक और सुन्दर चरित्र वाले व्यक्तियों के साथ रहें:

मानव एक दुसरे के साथ रहना पसन्द करता है। इस लिए अपने साथ उठने बैठने के लिए अच्छे व्यवहार एवं सद स्वभाव वाले व्यक्तियों का चयन करें जो आप को भलाइ और नेक कार्यों में समर्थन करें और अशुद्ध कर्मों से रोके और बुरे साथियों से दूर रहें, क्योंकि बुरा साथी बुराइ की ओर निमंत्रण करता है और वह उस से प्रभावित भी हो जाता है। यही कारण है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अच्छे साथियों और बुरे साथियों को एक उदाहरण के माध्यम से समझाया है,” बेशक नेक मित्र सुगंध बेचने वाले और बुरे मित्र लोहार की तरह है और सुगंध बेचने वाले मित्र तुम्हें खूश्बू लगाएगा या तुम उस से सुगंध खरीदोगे, या उस के संग रहने से अच्छी खूश्बू तुम्हारे अंग से आऐगी और बुरे मित्र लोहार की तरह है जिस के पास बैठने से या तो वह तुम्हारे कपड़े जला देगा या तुम्हारे शरीर से बदबू आऐगी ”  (सही मुस्लिम)

लोगों के साथ मिल जुल कर रहना चाहिये क्योंकि एकेले व्यक्ति को शैतान उचक कर अपने साथ कर लेता है और बुरे प्रकार के ख्याल उस के हृदय में डालता है। इसी कारण जो व्यक्ति अच्छे लोगों के साथ रहता है, अल्लह तआला ऐसे व्यक्ति को जन्नत में भी साथ कर देंगे।

मित्र तथा साथी संगत कैसा होना चाहिये ?

मित्र सुन्दर चरित्र वाला, निःस्वार्थ और बुद्धी वाला हो जो अपने मालिक का पुजक हो, नरम हृदय वाला, दोस्तों को अच्छा सलाह देने वाला, अपने मित्रों को अच्छाइ की ओर निमंत्रण करने वाला और दुर्व्यवहार से रोकने वाला हो, बुराइयों से सूचना देने वाला हो। यदि समय हो तो अच्छे दोस्तों के घर जाऐं या उसे अपने घर बुलाए, फोन और मोबाइल के माध्यम से बात चीत, ई मेल और मैसेंजर के माध्यम से सम्पर्क में रहें।

 

(5)   परिक्षा और सब्र:

अल्लाह तआला अपने भक्तों का परिक्षा लेता है कि कौन व्यक्ति वास्तविक भक्त है और इस परिक्षाओं में सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को बहुत ज़्यादा पुरस्कार देगा, यह अल्लाह का अपने बन्दों से किया हुआ वचन है। ” और ज़रूर हम तुम लोगों को परिक्षा में डालेंगे, ताकि तुम्हारी हालतों की जाँच करें और देख लें कि तुम में जानतोड़ प्रयास करने वाले और मज़बूती से जमे रहने वाले कौन है?”  (सूरः मुहम्मद)

अल्लाह तआला अपने बन्दों को परेशानी, संकट और बीमारी में डाल कर परिक्षा लेता है, कौन उन में से सब्र करता है और कौन अल्लाह का इन्कार करता है? अपने घर वालों, दोसतों, दुकान मालिक, सरकारी अधिकारी, साथ में काम करने वाले व्यक्ति, तथा रूममेट की ओर से यह परेशानियाँ, संकट , बुरे शब्दों का प्रयोग, लान तान , मज़ाक उड़ाना, बाइकाट के रूप में पीड़ित किया जाता है, तो कभी धोका और मक्कारी के माध्यम से परेशान किया जाता है। अल्लाह तआला ने भी इस बात की सूचना दिया है। ” और हम ज़रूर तुम्हें डर, भूख, जान-माल, की हानियों और आमदनियों के घाटे में डाल कर तुम्हारी आज़माइश करेंगे, इन हालात में जो लोग सब्र से काम लें, और जब कोई मुसीबत पड़े, तो कहें कि हम अल्लाह ही के हैं और अल्लाह ही ओर हमें पलटकर जाना है, उन्हें खुशखबरी दे दो, उन पर उनके रब की ओर से बड़ी कृपाँए होंगी, उसकी दयालुता उन पर साया करेगी और ऐसे ही लोग सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं।”  (सूरः अल-बक़राः155)

बेशक सब्र करने वालों को उन के सब्र के अनुसार, ज़्यादा परेशानियाँ झेलने के कारण बहुत ज़्यादा बदला दिया जाऐगा जिसका हिसाब ही नहीं लगाया जा सकता, अल्लाह तआला का यह शुभ खबर पढ़ें, ” सब्र करने वालों को तो उनका बदला बेहिसाब दिया जाएगा।” (सूरः अज़-ज़ुमरः55)

प्रिय भाईयोः आप को परेशानियाँ, संकट, तक्लिफ और दोस्तों से हृदय को ठेस पहुंचाने वाली बातें सुनने को मिलेगी. ऐसे परिस्थितियों में सब्र करें क्योंकि अल्लाह तआला भी सब्र करने वालों से प्रेम करता हैं और उन्हें बेहिसाब अच्छा बदला देगा।

 

 (6)   नरमी, दयालुता:

विरोधियों के साथ नरमी से पेश आऐं, उनको अच्छे तरीके तथा प्रेम के साथ इस्लामिक शिक्षा का परिचय करवाऐं। उन्हें इस्लाम की ओर निमंत्रण करने में सरल कार्य का प्रयोग करें जिस में पाप न हों, अल्लाह तआला ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को सरलता को चुनने तथा कठोरता से दूर रहने का आदेश दिया है। ” (ऐ पैग़म्बर) यह अल्लाह की बहुत दयालुता है कि तुम इन लोगों के लिए बहुत नर्म स्वभाव के हो, अन्यथा यदि तुम कहीं क्रूर स्वभाव और कठोर हृदय के होते तो ये सब तुम्हारे आस-पास से छँट जाते, इन के क़ुसूर माफ कर दो, इनके लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो”  (सूरः आलि-इमरानः159)

इस्लाम धर्म आसान है और अल्लाह तआला मानव के साथ सरलता चाहता है और सख्ती को पसन्द नहीं करता जैसा कि अल्लाह का पवित्र क़ुरआन में फरमान है, ” अल्लाह तुम्हारे साथ नरमी करना चाहता है, सख्ती करना नहीं चाहता।” (सूरः अल-बक़राः185)

आप लोग भी लोगों के साथ दयालुता का व्यवहार करें, आप अपने शक्ति के अनुसार कर्म करें, अल्लाह तआला हर मानव की शक्ति तथा किसी चीज़ के करने की क्षमता को जानता है। किसी भी चीज़ में कठोरता का प्रयोग न करें चाहे वह इबादत एवं उपासना का मामला क्यों न हो।

 

(7)   अल्लाह को बार बार याद करें:

अल्लाह के सुन्दर नामों और विशेषताओं को दोहराऐं, बार बार प्रेम के साथ पढ़ें, अल्लाह की विशेषताओं पर गंभीरता से विचार करें, तो बहुत सवाब प्राप्त होगा, बहुत नेकियां हासिल होंगी, हृदय को शान्ति मिलेगी, जिन्न और शैतान उन व्यक्तियों से दूर रहता है जो अल्लाह को हमेशा याद रखते हैं।

अल्लाह को बार बार याद रखने से निम्नलिखित लाभ हासिल होता है।

(क)  अल्लाह तआला का ज़िक्र (बार बार याद) हृदय और जीभ की इबादत है। जो लोग अल्लाह का बहुत ज़िक्र करते हैं, उनका हृदय जीवित रहता है। अल्लाह तआला ने ऐसे लोगों की प्रशंसा बयान किया है जो हर लक्षण अल्लाह के ज़िक्र में ब्यस्त रहते हैं, अल्लाह का कथन है। ” जो उठते बैठते और लेटते, हर हालत में अल्लाह को याद करते हैं और आकाश और धरती की संरचना में सोच-विचार करते हैं।” (सूरःआलि-इमरानः191)

जो लोग अल्लाह का ज़िक्र नहीं करते, उनका हृदय परेशान और असंतुष्ट होता है। शैतान उसके हृदय में बुरे विचार डाल कर उसे डराता और भयभीत रखता है।

(ख) जो लोग अल्लाह तआला का ज़िक्र (बार बार याद) करते हैं तो अल्लाह तआला उन्हें परेशानियों, संकटों के समय अल्लाह पर ईमान की सुरक्षा करते हैं। ग़म तथा घुठन, निराश और शैतान के अशुद्ध विचार हृदय में डालने से महफूज़ रखते हैं। अल्लह का फरमान है। ” वास्तव में जो लोग (अल्लाह) डर रखने वाले हैं, उनका हाल तो यह होता है कि कभी शैतान के प्रभाव से कोई बुरा ख़्याल अगर उन्हें छू भी जाता है तो फौरन चौकन्ने हो जाते हैं और उन्हें साफ दिखाई देने लगता है कि उनके लिए उचित कार्यप्रणाली क्या है।” (सूरः अल-आराफः201)

(ग)  जो लोग अल्लाह का बहुत ज़िक्र करते हैं तो अल्लाह उन्हें याद रखता है और परेशानियों, घटनाओं के समय अल्लाह का समर्थन ऐसे लोगों के साथ होता है। अल्लाह का फरमान है। ” अतः तुम मुझे याद रखो, मैं तुम्हें याद रखूँगा और मेरा शुक्र अदा करो, नाशुक्री न करो,  (सूरः अल-बक़राः152)

(घ)  जो लोग अल्लाह का बहुत ज़िक्र करते हैं तो अल्लाह उन के पापों और अपराधों को क्षमा कर देता है, उस के हृदय को सुख-शांति प्रदान करता है और मृत्यु के पश्चात बहुत ही महान पुरस्कार देगा, अल्लाह तआला ने क़ुरआन में इसी का वादा किया है। ” और अल्लाह को ज़्यादा याद करने वाले पुरूषों तथा महिलाओं के लिए अल्लाह ने क्षमादान और बहुत बड़ा बदला तैयार कर रखा है।” (सूरः अल-अहज़ाबः 35)

(च) जो लोग अल्लाह का बहुत ज़िक्र करते हैं, तो क़ियामत के दिन वह पूर्ण ईमान और उच्च स्थान में उन लोगों से बहुत आगे बढ़ जाऐंगे जो अल्लाह का ज़िक्र नहीं करते। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन इसी बात की पुष्ठी करता है, रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कथन पर विचार करें ” मुफरेदून बहुत आगे बढ़ गए, सहाबा ने प्रश्न क्या कि ऐ, अल्लाह के रसूल! मुफरेदून का अर्थ क्या है? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उत्तर दिया, अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाले पुरूषें तथा महिलाऐं ” (सही मुस्लिम)

(छ)  जो लोग अल्लाह तआला का बहुत ज़िक्र करते हैं और जो लोग अल्लाह का ज़िक्र नहीं करते, उन दोनो की उदाहरण जिन्दे और मृत्यु की सी है। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है। ” जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करते हैं उनकी मिसाल और जो लोग अल्लाह का ज़िक्र नहीं करते, ज़िन्दे और मृत्यु की मिसाल की तरह है।” (सही बुखारी तथा सही मुस्लिम)

 

(8)  आप अच्छे और आदर्नीय शिक्षक का चयन करें:

(1)  अच्छे विद्वान से इस्लामिक शिक्षा प्राप्त करें जो आप को धीरे धीरे, उत्तम तरीक़े से शिक्षा दे।

(2)  जो गूरू समाज में इस्लामिक शिक्षण के अनुसार आप का सही मार्ग दर्शन करे,

(3)  जब आप कभी कोइ संकट, परेशानी, परीक्षा में हो तो वह आप की भरपूर सहायता करे, उस संकट से निकलने का उत्तम सलाह और सही तरीका बताए।

(4)  यदि शैतान आप को डराए, हृदय में अशुद्ध विचार डाले तो यह शिक्षक आप के ईमान को क़ुरआन और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कथन से शक्ति प्रदान करे। आप के ईमान को मज़बूत बनाए।

(5) यदि आप से भूल चुक हो जाए तो आप को याद दिला दे। अच्छे तरीक़े से आप को शिक्षा दे। आप को अल्लाह की रहमतों से निराश न होने दे बल्कि अल्लाह के क्षमा और दयालुता को याद दिला कर तौबा और प्रायश्चित करेने का सलाह दे।

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