कुरआन क्या है ?

क्या मानव भाग्य के आगे विवश है या उसे चयन की शक्ति है ?

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भाग्य को सही तरीके से समझने के लिए इन चार बातों पर गंभीरता से विचार करना अनिवार्य है फिर प्रत्येक मुस्लिम के लिए भाग्य के इन चारों वर्गों पर ईमान लाना जरूरी है।

(1)  अल्लाह के अज्ली इल्म पर ईमान लाना जो कि प्रति वस्तु को सम्मिलित और घेरे हुए है। अल्लाह तआला का कथन है,

” ألم تعلم أن الله يعلم ما في السموات و الأرض ” – الحج:70

क्या तुम जानते नहीं कि आकाश और धरती की हर चीज़ अल्लाह के ज्ञान में है। सब कुछ को एक किताब में अंकित किया है, अल्लाह के लिए यह बहुत सरल है। (सूरः हज्जः 70)

(2) अल्लाह ने अपने ज्ञान के अनुसार जो नसीब में लिख दिया है, उस पर ईमान लाया जाए। क्यों कि वह वैसे ही होगा जैसा कि भाग्य पत्रिका में लिखा जा चुका है। अल्लाह तआला का कथन है,

” ما فرطنا في الكتاب من شيئ ”  – الأنعام: 38

अर्थः  हम्ने भाग्य के लेख में कोइ कमी नहीं छोड़ी है। (सूरः अन्आमः 38)

रसूल (सल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया

” كتب الله مقادير الخلائق قبل أن يخلق السموات و الأرض بخمسين ألف سنة”

अर्थः अल्लाह तआला ने आकाशों और धरती की रचने से पचास हज़ार वर्ष पुर्व ही सर्व मानव के भाग्य को लिख दिया है।

(3)  हर चीज़ अल्लाह की इच्छा और चाहत के अनुसार होती है। बिना उस के अनुमति के एक पत्ता भी अपने स्थान हिल नहीं सकता, इस बात पर कठोर विश्वास रखा जाए। अल्लाह तआला फरमाता है।

” و ما تشاؤون إلا أن يشاء الله رب العالمين ” – التكوير: 29

 आयत का अर्थः ” और तुम्हारे चाहने से कुछ नही होता जब तक सारे संसार का स्वामी अल्लाह न चाहे ” (सूरः तक्वीरः29)

(4)  अल्लाह ही सम्पूर्ण वस्तु का उत्तपादक तथा रचनाकर्ता है। उसने प्रति वस्तु को मनुष्य के प्रयोग के लिए पैदा किया और मनुष्य को अल्लाह की इबादत के लिए पैदा किया है। अल्लाह तआला का कथन है।

” الله خالق كل شيئ وهو على كل شيئ وكيل ” – الزمر:62

अर्थः ” अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है और वही हर चीज़ पर निगह्बान है।” (सूरः अज़्ज़ुमरः 62)

जब यह स्पष्ट हो गया कि अल्लाह ने भाग्य के प्रति प्रत्येक वस्तुओं के बारे में अंकित कर दिया है और यह सब अल्लाह के ज्ञान में हमेशा से है और हमेशा रहेगा और हर चीज़ वैसे ही होगा जिस प्रकार भाग्य पत्रिका में लिखा हुआ है और अल्लाह की इच्छा के बिना कोई वस्तु अपने स्थान से हिल भी नहीं सकती और प्रत्येक वस्तुओं का मालिक, स्वामी और सृष्ठीकर्ता अल्लाह ही है।

अल्लाह ने नसीब और भाग्य के मामले में मानव के शक्ति और इख्तियार को दो वर्ग में बांट दिया है।

(1)  कुछ चीज़ों में मानव को बिल्कुल शक्ति और इख्तियार नहीं है। जैसा पैदा होना, मृत्यु, रोग, दुर्घटना में ग्रस्त होना आदि और इन वस्तुओं के प्रति मानव से अल्लाह हिसाबो किताब और प्रश्न नहीं करेगा। बल्कि इन परेशानियों में सही तरीके से सब्र करने पर बहुत ज़्यादा पुण्य देगा जैसा कि अल्लाह ने अपने सब्र करने वाले बन्दों से वादा किया है।

(2) भाग्य का दुसरा वर्ग जिस पर मानव को पूरी तरह इख्तियार है और किसी चीज़ के करने या न करने की क्षमता और शक्ति है और अल्लाह ने अच्छाई और बुराई में परखने की क्षमता दी है और बुराइ से दूर रहने और अच्छाई के करने पर उभारने के लिए नबियों और रसूलों को दुनिया में भेजा, तो जो व्यक्ति उन रसूलों और संदेष्ठाओं के कथनों के अनुसार जीवन बिताऐगा, वह अल्लाह के पास सफलपूर्वक होगा और जो उनके आदेशों के विरोध जीवन गुज़ारेगा, वह नाकाम और घाटा उठाऐगा।

अल्लामा इब्ने तैमिया कहते हैं। ” बन्दे अपने कर्तव्य को स्वयं ही करने वाला है और अल्लाह बन्दों के कर्तव्य का रचनाकर्ता है और बन्दा अपने कर्म के अनुसार मुमिन और अपने के कर्म के कारण काफिर बनता है और अपने कर्म के कारण नेक और अपने कर्म के कारण पापी होता है। मानव को नमाज़ पढ़ने, रोज़ा रखने और किसी भी प्रकार के कार्य करने का पूरी क्षमता है और अल्लाह उनके इख्तियार और क्षमता का सृष्ठीकर्ता है। जैसा कि अल्लाह तअला का इर्शाद है।

 ” لِمَنْ شَاءَ مِنْكُمْ أَنْ يَسْتَقِيمَ (28) وَمَا تَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ ”  (التكوير:29)

” तुम में से प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो सीधे मार्ग पर चलता है और तुम्हारे चाहने से कुछ नहीं होता जब तक सारे जहान का रब न चाहे।” (सूरः तक्वीरः29)

इस आयत में अल्लाह ने स्पष्ठ कर दिया कि मानव के क्षमता में है कि वह सीधे मार्ग पर चले या अशुद्ध पद पर चले।

अल्लामा इब्ने उसैमीन से प्रश्न किया गया कि क्या मानव भाग्य के आगे विवश है या उसे कर्म में चयन करने की शक्ति प्रदान की गई है

तो अल्लामा (अल्लाह उन पर दया करे) ने उत्तर दियाः क्या प्रश्न करने वाले ने स्वयं प्रश्न किया या किसी ने उसे यह प्रश्न करने पर विवश किया ? , फिर मानव ध्यान पूर्वक विचार करे और स्वयं अपने मन से प्रश्न करे कि क्या उस पर आने वाली संकट उसे के चयन करने से आते हैं ?  क्या रोग उस के इच्छा से आती है ? क्या मृत्यु उसके इख्तियार में है ? इस जैसे दुसरे प्रश्नों से समझ में आजाऐगा कि मानव भाग्य के आगे विवश है या उसे कर्म करने की क्षमता है।

फिर अल्लामा उत्तर देते हैं। ” बुद्धी वाला मानव बैशक जो भी कार्य करता है वह अपने इख्तियार और इच्छा के अनुसार करता है। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है।

” فَمَنْ شَاءَ اتَّخَذَ إِلَى رَبِّهِ مَآباً ” (النبأ:39)

” तो जिसका जी चाहे अपने रब की ओर पलटने का मार्ग अपना ले। ” –   सूरः नबाः 39

” مِنْكُمْ مَنْ يُرِيدُ الدُّنْيَا وَمِنْكُمْ مَنْ يُرِيدُ الْآخِرَةَ ” –  آل عمران :152

” तुम में कुछ लोग दुनिया के इच्छुक थे और कुछ आखिरत की इच्छा रखते थे।” सूरः आले इमरानः 152

” وَمَنْ أَرَادَ الْآخِرَةَ وَسَعَى لَهَا سَعْيَهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَئِكَ كَانَ سَعْيُهُمْ مَشْكُوراً” (الإسراء:19)

” और जो आखिरत का इच्छुक हो और उसके लिय प्रयास करे जैसा कि उस के लिए प्रयास करना चाहिए और वह हो ईमान वाले, तो ऐसे हर व्यक्ति के प्रयास की क़द्र की जाएगी।” सूरः अल-इसराः 19

तो गोया कि अल्लाह तआला ने मानव को पूर्ण शक्ति दी है चाहे वह ईमान लाए या चाहे अल्लाह पर ईमान न लाए, कोई भी उसे कुफ्र करने पर विवश नही कर सकता और कोई किसी को ईमान लाने पर विवश नहीं कर सकता, जिस तरह कोई इस स्कूल में दाखिला लेता है तो दुसरा अपनी इच्छा से दुसरे महाविद्धयालय में एडमीशन लेता है। कोई अपने इच्छा से यात्रा करता है, तो कुछ अपनी इच्छा से व्यपार करता, तो कुछ जाब करता है परन्तु कुछ चीज़ ऐसी भी है जिस में मानव को कुछ भी इख्तियार नहीं है। जैसे कि आंधी, भूकंप, दूर्घटना, वर्षा का होना, मृत्यु, लड़का या लड़की और चहरे का रूप और रंग आदि। यह सब अल्लाह के लिखित भाग्य के अनुसार ही होगा परन्तु कोई नही जानता के उस के भाग्य में किया अंकित है, इस लिए प्रयास और कोशीश करना है और कोशीश का फल अल्लाह से आशा रखना है और अल्लाह से दुआ करना है। बुखारी शरीफ इस हदीस पर विचार करें,

عن علي بن أبي طالب قال:كان النبي صلى الله عليه وسلم في جنازة ، فأخذ شيئا فجعل ينكت به الأرض ، فقال : ما منكم من أحد ، إلا وقد كتب مقعده من النار ومقعده من الجنة . قالوا : يا رسول الله ، أفلا نتكل على كتابنا وندع العمل ؟ قال : اعملوا فكل ميسر لما خلق له ، أما من كان من أهل السعادة فييسر لعمل أهل السعادة ، وأما من كان من أهل الشقاء فييسر لعمل أهل الشقاوة . ثم قرأ :{ فأما من أعطى واتقى . وصدق بالحسنى } الآية. (صحيح البخاري-:4949)

अली बिन अबी तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक जनाज़ा में थे तो कोई चीज़ (लक्ड़ी) लिया और उस से धरती को कुरेदने लगे और फरमायाः तुम में से प्रत्येक व्यक्ति के लिए दो ठेकाना अंकित कर दिया गया है, एक घर जन्नत (स्वर्ग) में और एक घर जहन्नम (नरक) में। सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल! तो क्यों नहीं हम नसीब (भाग्य) पर भरोसा करते हुए अमल करना छोड़ दें ? तो आप (सल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दियाः तुम लोग नेक कर्म करो, हर एक के लिए वह कर्म सरल कर दिया जाऐगा जिस के लिए उसे उत्पन किया गया है। जो नेक लोग होंगे, उन्हें नेक कर्मों के करने की क्षमता प्रदान कर दिया जाऐगा और जो बुरे लोग होंगे, उन के लिए बुरे कर्म करना सरल होगा। फिर आप ने यह आयत पढ़ी. तो जिसने (अल्लाह के मार्ग में) धन दिया और (अल्लाह की अवज्ञा से) परहेज़ किया…

(सही बुखारीः 4949)

अल्लाह तआला ने मानव को बुद्धि दी है और अच्छे तथा बुरे में अन्तर करने की क्षमता प्रदान की है और जो अपनी इच्छा से जैसा कर्तव्य करेगा, उसी के अनुसार उसे बदला मिलेगा, अल्लाह के इस कथन पर विचार करे,

” مَنْ كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الْآخِرَةِ نَزِدْ لَهُ فِي حَرْثِهِ وَمَنْ كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ نَصِيبٍ ” (الشورى :20)

” जो कोई आखिरत की खेती चाहता है, उसकी खेती को हम बढ़ाते हैं और जो दुनिया की खेती चाहता है, उसे दुनिया ही में से दे देते हैं मगर आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं है।” –  अश-शूराः 20

इस आयत से भी स्पष्ठ हुआ कि मानव जैसा इस दुनिया में कर्म करेगा, जिस लक्ष्य के लिए प्रयास करेगा, जिस इच्छा के कारण कार्य करेगा तो अल्लाह उसी के अनुसार बदला देगा।

पाप कर ले, गुनाहों का कार्य कर ले, अप्राध कर ले, भुल चुक हो जाए परन्तु अल्लाह से अपने गुनाह , पापों , बुरे कर्म और भुल चुक पर क्षमा मांगे तो अल्लाह बहुत माफ करने वाला, क्षमा करने वाला, अत्यन्त दयालु है और खुश हो कर अपने दासों , भक्तों और बन्दों के माफी को स्वीकारित करता है। अब मैं अपनी बात को इस दुआ पर स्माप्त करता हूँ।

 رَبَّنَا لاَ تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا رَبَّنَا وَلاَ تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا رَبَّنَا وَلاَ تُحَمِّلْنَا مَا لاَ طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنتَ مَوْلانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِين   -سورة البقرة: 286

” ऐ हमारे रब, हमसे भूलचूक हो जाए या हम से खताएँ हो जाए, तो उन पर हमारी पकड़ न कर, मालिक, हम पर वह बोझ न डाल जो तूने हम से पहले लोगों पर डाले थे, रब, जिस बोझ को उठाने की ताक़त हम में नहीं है, वह हम पर न रख, हमारे साथ नरमी कर, हमें माफ कर दे, हम पर दया कर, तू ही हमारा स्वामी है, इनकार करने वालों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर।”-  सूरः अल्बक़राः 286

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