कुरआन क्या है ?

तौहीदे अस्मा व सिफात

तौहीदे अस्मा व सिफातअल्लाह पाक को उनके नामों और विशेषताओं में यकता और तन्हा मानने का मतलब किया है ?

तौहीदे अस्मा व सिफात का मतलब या अल्लाह पाक को उसके नामों और विशेषताओं में यकता और तन्हा मानने का मतलब यह है कि  इस बात पर पुख्ता आस्था हो कि अल्लाह तआला के सम्पूर्ण नाम अच्छे और सुन्दर हैं और वह अपने सम्पूर्ण विशेषताओं और गुनों में पूर्ण है। अल्लाह तआला कमी और खामी से पवित्र तथा पाक व साफ है। वह अपने सर्व अच्छे नामों और गुनों और विशेषताओं में तन्हा है। कोई उसका भागीदार और साझीदार नहीं है। जिन नामों का बयान अल्लाह तआला ने अपनी किताब क़ुरआन करीम में किया है या उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सही हदीसों में किया है। उन सिफात और नामों में कोई अल्लाह के बराबर नहीं, कोई अल्लाह के हमसर नहीं, कोई अल्लाह का साझीदार और भागीदार नहीं, न ही उसके सिफात और गुनों का रूप और आकार बयान किया जाए और नहीं किसी वस्तु से उदाहरण और मिसाल दी जाए और न ही उसके नामों और गुनों और सिफातों के अर्थों का इन्कार किया जाए और न ही उनके अर्थों को बदला जाए बल्कि उन नामों और सिफात को वैसे ही साबित किया जाए जैसा कि अल्लाह के शान के योग्य है और उन सिफातों और नामोंकी अल्लाह से इन्कार की जाए जिन को अल्लाह तआला ने अपने से इन्कार किया है या उस के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह से इन्कार किया है।

अल्लाह का फरमान है।

وَلِلَّـهِ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ فَادْعُوهُ بِهَا ۖ وَذَرُ‌وا الَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِي أَسْمَائِهِ ۚ سَيُجْزَوْنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ. (سورة الأعراف: 180)

अच्छे नाम अल्लाह ही के हैं। तो तुम उन्हीं के द्वारा उसे पुकारो और उन लोगों को छोड़ो जो उसके नामों के सम्बन्ध में कुटिलता ग्रहण करते है। जो कुछ वे करते हैं, उसका बदला वे पाकर रहेंगे।  (7-सूरह अल् आराफः 180)

दुसरी आयत में अल्लाह ने अच्छे नामों से पुकारने पर प्रोत्साहित किया है।

قُلِ ادْعُوا اللَّـهَ أَوِ ادْعُوا الرَّ‌حْمَـٰنَ ۖ أَيًّا مَّا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ. (سورة الإسراء: 110)

कह दो, “तुम अल्लाह को पुकारो या रहमान को पुकारो या उसे जिस नाम से भी पुकारो, उसके लिए सब अच्छे ही नाम हैं।” (17- सूरह अल-इस्राः 110)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन नामों को याद कर के, उनके अनुसार जीवन व्यतीत करने का लाभ भी बयान फरमा दिया है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का प्रवचन है।

و عن أبي هريرة (رضي الله عنه) أن رسولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قال : إن للهِ تسعةً وتسعين اسمًا ، مائةً إلا واحدًا ، مَن أحصاها دخلَ الجنةَ .(صحيح البخاري: 2736)

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः बेशक अल्लाह 99 नाम  हैं तो जिसने उसे याद किया और शुमार किया तो वह जन्नत में दाखिल होगा। (सही बुखारीः 2736)

इस का मतलब यही है कि अल्लाह के अच्छे नामों और पूर्ति विशेषता को याद कर के , उन के अर्थ को अपने हृदय में दाखिल किया जाए, और उनके अनुसार अमल किया जाए और उन अच्छे नामों और पूर्ति विशेषताओं के विरूद्ध अमल न किया जाए। परन्तु अल्लाह के अच्छे नाम केवल इन ही 99 नामों पर सिमित नहीं है। बल्कि असिमित हैं जैसा कि सही हदीस में वर्णन है। अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः

ما أصاب أحدًا قط همٌّ و لا حزنٌ ، فقال : اللهمَّ إني عبدُك ، و ابنُ عبدِك ، و ابنُ أَمَتِك ، ناصيتي بيدِك ، ماضٍ فيَّ حكمُك ، عدلٌ فيَّ قضاؤُك ، أسألُك بكلِّ اسمٍ هو لك سميتَ به نفسَك ، أو علَّمتَه أحدًا من خلقِك ، أو أنزلتَه في كتابِك ، أو استأثرتَ به في علمِ الغيبِ عندَك ، أن تجعلَ القرآنَ ربيعَ قلبي ، و نورَ صدري ، و جلاءَ حزني ، و ذَهابَ همِّي ، إلا أذهبَ اللهُ همَّهُ و حزنَه ، و أبدلَه مكانَه فرجًا قال : فقيل : يا رسولَ اللهِ ألا نتعلَّمُها ؟ فقال بلى ، ينبغي لمن سمعَها أن يتعلَّمَها. (السلسلة الصحيحة: العلامة الألباني: 199)

जब किसी को कोई ग़म तथा परेशानी पहुंचती है तो वह कहता है।  ऐ अल्लाह! मैं तेरा दास हूँ, तेरे दास का बेटा हूँ, तेरे दासी का बेटा हूँ, मेरी पेशानी तेरे हाथ में है, मुझ में तेरा आदेश लागू होता है, मेरे प्रति तेरा निर्णय न्याय पर आधारित है, मैं तुझ से तेरे प्रत्येक उस नाम से प्रश्न करता हूँ जिसे तूने अपने लिए चुना है, या तूने अपने मख्लूक में से किसी को खबर दिया हो या तूने अपनी पुस्तक में उतारा हो, या तूने अपने पास परोक्ष में गुप्त रखा हो, कि क़ुरआन को मेरे हृदय में प्रवेश कर दे, मेरे सीने को प्राकाश से भर दे, और मेरे गमों को दूर कर दे, और मेरी कठिनाइयों को खत्म कर दे, तो अल्लाह उस के गम, परेशानियों को दूर कर देता है और परेशानियों से निकलने का रास्ता आसान कर देता है। तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म) से प्रश्न किया गया कि क्या हम इसे सीख न ले ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म) ने फरमायाः क्यों नहीं! जो कोई भी यह दुआ सुने, तो उसे याद कर लेना चाहिये। (अस्सिल्सिला सहीही , अल्लामा अल्बानीः 199)

इस हदीस में एक वाक्य ” तूने अपने पास परोक्ष में गुप्त रखा हो ” यह है। जो स्पष्ट करता है कि अल्लाह ने कुछ अपने नामों को अपने पास गुप्त रखा है जिसे अपने नबियों और रसूलों को भी खबर नहीं दिया है। गोया कि अल्लाह के अच्छे नाम केवल 99 पर सिमित नहीं बल्कि अल्लाह ही अपने नामों की सख्यां को जानता है।

अल्लाह के नामों में इल्हाद या टेढ़ा पन चयन करने का मतलब किया है ?

अल्लाह के नामों में इल्हाद या टेढ़ा पन चयन करने का मतलब निम्न में बयान किया जाता है।

1-  उसके सम्पूर्ण नामों या विशेषताओं या उस में से कुछ का इन्कार कर दिया जाए।

2-  उसके सम्पूर्ण नामों और विशेषताएँ जिस अर्थ को स्पष्ट करते हैं, उन्हें न माना जाए, बल्कि उसे मतलब को बदल दिया जाए, परिवर्तन कर दिया जाए, जैसे कि अल्लाह का कथन है।

بَلْ يَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ. (سورة المائدة: 64)

बल्कि उसके दोनो हाथ तो खुले हुए है। (5- सूरह माईदाः 64)

जो लोग भी अल्लाह के हाथ का मतलब ताकत, कुव्वत , शक्ति या अन्य अर्थात करते हैं. तो वह अल्लाह की विशेषता में इल्हाद (टेढ़ा पन) कर रहे हैं।

3- अल्लाह के नामों तथा सिफात (विशेषताएँ) जिन मतलब और अर्थ पर दलालत करते हैं, उनके विरूद्ध अमल किया जाए। जैसे कि अल्लाह का एक नाम (अलरज़्ज़ाक़ः الرزاق) है। जिस का अर्थ है कि अल्लाह की रोज़ी और रिज़्क का मालिक है। इस में इल्हाद (टेढ़ा पन) का मतलब यह होगा कि रोज़ी और रिज़्क के लिए अल्लाह के सिवा दुसरे के पास जाया जाए, अल्लाह तआला के साथ किसी दुसरे को रोज़ी देने वाला समझा जाए। जो शिर्क और इल्हाद की सूची में शुमार होगा।

अल्लाह तआला के सब अच्छे और पूर्ण नाम और उच्च सिफात (विशेषता तथा गुण) हैं। और अल्लाह तआला के जैसा कोई नहीं है और न ही इस दुनिया और आखिरत में कोई  उसका भागीदार और साझीदार है। उदाहरणः अल्लाह के नामों में से एक नाम अल-हयय (الحي) जिसका अर्थ होता है, जीवित रहने वाला, इसी से अल्लाह तआला की सिफत हयात (जीवन) साबित होती है। इस लिए अल्लाह के लिए हयात (जीवन) सिफत उस पूर्ण तरीके से साबित किया जाए जो अल्लाह तआला के शान और ज़ात के लिए उचित है। अल्लाह का जीवन हमेशा से है और हमेशा बाकी रहेगा। जो कभी समाप्त नही होगा। जिस में पूर्ति की सम्पूर्ण विशेषता उपलब्ध हैं। जिस में उसका कोइ भागीदार और साझीदार नहीं है। उसके बराबर और उसके जैसा नहीं है। अल्लाह तआला का फरमान है।

اللَّـهُ لَا إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ.  (سورة البقرة: 255)

अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थाई है, उसे ऊँघ तथा निद्रा नहीं आती। (2-सूरह अल-बकराः 255)

अल्लाह तआला के लिए प्रमाणित सिफात उसी प्रकार साबित किया जाए जो अल्लाह के ज़ात और शान के लाइक है।

इसी प्रकार अल्लाह तआला को सम्पूर्ण कमी, खराबी और बुरे विशेषता से पवित्र और पाक एवं साफ माना जाए। जैसे कि निद्रा, अज्ञानता, अत्याचार एवं विश्राम करना इत्यादि जैसी कमी विशेषताओं से पवित्र तथा पाक व साफ तस्लीम किया जाए। इसी प्रकार अल्लाह के जैसा किसी को न माना जाए और प्रत्येक कमी विशेषता का इनकार किया जाए जिसका इन्कार अल्लाह तआला ने अपनी ज़ात से किया है या अल्लाह के रसूल ने अल्लाह की ज़ात से किया हो। जैसा कि अल्लाह का फरमान है।

لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ. (الشورى: 42/ 11)

‌उसके सदृश कोई चीज़ नहीं। वही सब कुछ सुनता, देखता है।   (42- सूरह अश्शूराः 11)

अल्लाह तआला की महान विशेषताओं को तस्लीम करने के प्रति कुछ चीज़ों को ध्यानपूर्वक समझना चाहिये।

1-  अल्लाह तआला की सम्पूर्ण उच्च विशेषताएँ तौक़ीफी हैं। अर्थातः केवल उन ही विशेषताएँ और नामों को अल्लाह के लिए प्रमाणित किया जाए जो क़ुरआन करीम और सही हदीसों से प्रमाणित होता हो।

2-  क़ुरआन करीम और सही हदीसों से प्रमाणित सम्पूर्ण नामों तथा विशेषताएँ को वैसे ही माना जाए जिस अर्थ के लिए आया है।

3-  इस बात पर पुख्ता विश्वास और आस्था हो कि अल्लाह तआला अपने सम्पूर्ण विशेषताएँ में पूर्ण हैं और कमी और नुक़्सान से पाक व पवित्र है।

4- अल्लाह तआला की विशेषताएँ और मख्लूक की विशेषताएँ में बहुत अन्तर हैं। दोनों में तनिक भी समानता नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की विशेषताएँ, उसके शान के योग्य है और मख्लूक की विशेषताएँ, उसके व्यक्तिगत के योग्य है।

5- अल्लाह तआला की विशेषताएँ के रूप तथा आकार की प्रस्थिति केवल अल्लाह ही जानता है। अतः उसके रूप न बयान की जाए और न ही उन सिफात के अर्थ को परिवर्तन किया जाए और न ही उनके अर्थ का इन्कार कर दिया जाए, बल्कि अल्लाह की सम्पूर्ण विशेषताएँ को वैसे ही माना जाए जो अल्लाह की ज़ात के लिए उचित और मुनासिब है।

अल्लाह तआला की सिफात (विशेषताएँ) दो प्रकार के हैं।

1-  ज़ाती सिफात (विशेषताएँ)

2-  इख्तेयारी सिफात (विशेषताएँ)

ज़ाती सिफात (विशेषताएँ): ज़ाती सिफात (विशेषताएँ) से मुराद वह उच्च विशेषताएँ हैं जो अल्लाह तआला की मुबारक ज़ात से सम्बन्धित हैं।  जो हमेशा अल्लाह की ज़ात से सम्बन्धित रहती हैं। जैसे कि अल्लाह का चेहरा, हाथ, पाँव, उंगलियाँ इत्यादि अल्लाह के लिए उन ही ज़ाती सिफात (विशेषताएँ) को साबित किया जाए जो अल्लाह के लिए क़ुरआन या सही हदीस में आया है और उन को वैसे ही माना जाए जिस अर्थ के लिए प्रयोग हुआ है।  जैसा कि अल्लाह का फरमान है।

وَمَا قَدَرُ‌وا اللَّـهَ حَقَّ قَدْرِ‌هِ وَالْأَرْ‌ضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَالسَّمَاوَاتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِ‌كُونَ. (سورة الزمر: 39/ 67)

उन्होंने अल्लाह की क़द्र न जानी, जैसी क़द्र उसकी जाननी चाहिए थी। हालाँकि क़ियामत के दिन सारी की सारी धरती उसकी मुट्ठी में होगी और आकाश उसके दाएँ हाथ में लिपटे हुए होंगे। महान और उच्च है वह उससे, जो उन के साथ शिर्क करते है। (39-सूरह अज़्ज़ुमरः 67)

इस आयत में अल्लाह तआला के लिए मुट्ठी और दांया हाथ आया है। तो अल्लाह के लिए मुट्ठी और दांया हाथ उसी प्रकार साबित किया जाए जो अल्लाह की शान एवं ज़ात के लिए उचित है। न ही इन विशेषताएँ के अर्थ को परिवर्तन किया जाए और न  इन विशेषताएँ के अर्थ का इन्कार किया जाए और न ही इन विशेषताएँ को दुसरी किसी वस्तु से तशबीह (समानता) दी जाए और न ही इन विशेषताएँ की अवस्था या हालत बयान की जाए और न ही उस की किसी विशेषताएँ का आकार बयान किया जाए बल्कि कहा जाए कि अल्लाह तआला की मुट्ठी और दांया हाथ है जैसाकि उस की शान एवं ज़ात के योग्य है।

इख्तेयारी सिफात (विशेषताएँ) का अर्थातः यह अल्लाह तआला के कुछ करने वाली सिफात हैं, कि जब अल्लाह तआला चाहता है, करता है। यह अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है और नहीं चाहता तो नहीं करता है। उदाहरणः अल्लाह तआला का रात के आखिर भाग में दुनियावी आकाश पर आना, खुश होना, गुस्सा होना, नाराज होना, मुस्कुराना, इन्तेकाम लेना, इत्यादि तो अल्लाह तआला जब चाहता करता है और जब नही चाहता, नहीं करता। अल्लाह के लिए जो भी सिफात (विशेषताएँ) क़ुरआन या सही हदीस में वर्णन हैं तो उन को वैसे ही माना जाए जिस अर्थ के लिए प्रयोग हुआ है। उन सिफात(विशेषताएँ) के अर्थ को परिवर्तन नहीं किया जाए और न ही  इन विशेषताएँ के अर्थ का इन्कार किया जाए और न ही इन विशेषताएँ को दुसरी किसी वस्तु से तशबीह (समानता) दी जाए और न ही इन विशेषताएँ की अवस्था या हालत बयान की जाए और न ही उस की किसी विशेषता का आकार बयान किया जाए बल्कि कहा जाए कि अल्लाह तआला हंसता है जैसाकि उस की शान एवं ज़ात के योग्य है। बन्दे के अच्छे कर्म पर खुश हो कर हंसता है तो किसी बन्दे के बुरे कर्मों पर गुस्सा होता है। यह अल्लाह की इच्छा पर आधारित है जैसा की अल्लाह के शान के मुनासिब है। उन पर वैसे ही ईमान और आस्था रखा जाए जैसा अल्लाह की ज़ात के लिए उचित है।

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है।

يَضحَكُ اللهُ إلى رجُلَينِ. يَقتُلُ أحدُهما الآخَرَ. كلاهما يدخُلُ الجنَّةَ. فقالوا: كيفَ ؟ يا رسولَ اللهِ ! قال: يُقاتِلُ هذا في سبيلِ اللهِ عزَّ وجَلَّ فيُستَشهَدُ. ثم يَتوبُ اللهُ على القاتِلِ فيُسلِمُ. فيُقاتِلُ في سبيلِ اللهِ عزَّ وجَلَّ فيُستَشهَدُ.  (صحيح مسلم:  1890


अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः अल्लाह तआला दो आदमी की ओर देख कर मुस्कुराता है। उन में से एक दुसरे को क़त्ल कर देता है और दोनों जन्नत में दाखिल होंगे। तो सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने प्रश्न क्या, वह कैसे ? ऐ अल्लाह के रसूल! , तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः पहला व्यक्ति अल्लाह के रास्ते में जेहाद करता है। तो वह अल्लाह के रास्ते में शहीद कर दिया जाता है। फिर क़ातिल को अल्लाह इस्लाम स्वीकार करने की तौफीक देता है तो वह भी इस्लाम स्वीकार कर लेता है और अल्लाह के रास्ते में लड़ाइ करते हुए शहीद हो जाता है।  (सही मुस्लिमः 1890)

सही मुस्लिम की इस रिवायत में अल्लाह के लिए मुस्कुराना साबित होता है तो अल्लाह के लिए मुस्कुराना साबित किया जाए जैसे कि अल्लाह की ज़ात और शान के लाइक है।

अल्लाह के मुस्कुराने सिफत के अर्थ को न बदला जाए और न ही उस विशेषता को किसी मख्लूक से तश्बीह (समानता) दी जाए। और न ही उस विशेषता का इन्कार किया जाए और न ही किसी मख्लूक के मुस्कुराने से उदाहरण दी जाए बल्कि यह आस्था रखा जाए कि अल्लाह तआला अपने दासों और भक्तों से खुश हो कर मुस्कुराता है जैसा कि अल्लाह की शान के लिए उचित है। (W-2431)

अल्लाह तआला के सम्पूर्ण अच्छे नामों और सिफात (विशेषताएँ) का आदर-सम्मान करना प्रत्येक मुस्लिम पर अनिवार्य है। ईमान का तकाज़ा है कि अल्लाह के नामों और सिफात के अनुसार जीवन व्यतीत की जाए। ताकि हमें ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह के नामों तथा विशेषताओं के माध्यम से बरकत हासिल हो।

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