कुरआन क्या है ?

तौहीद के प्रति हम पर क्या अनिवार्य है ?

तौहीद तौहीद के लिए ही पूरे संसार की रचना हुई है, इस लिए इसे सही तरीके से समझना और इसके  विरोध  आस्थाओं से दूर रहना एक मुसलमान का कर्तव्य है, इसी के द्वारा एक व्यक्ति दुनिया और आखिरत में सफलता प्राप्त कर सकता है। इस लिए आइए निम्न लेख द्वारा हम यह जानते  हैं कि अल्लाह को एक मानने के प्रति हम पर क्या ज़िम्मेदारियाँ आती हैं ?

प्रथम ज़िम्मेदारीः  तौहीद का ज्ञानः

हम पर सब से प्रथम वाजिब तौहीद की जानकारी प्राप्त करना है। क्योंकि तौहीद के तकाज़ों और उसके शर्तों को उसी समय समझा जा सकता है जब हम तौहीद का ज्ञान प्राप्त करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति पर सर्व प्रथम किसी कर्म करने से पूर्व उसका का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य है। ताकि वह उस कर्म को अतिसुन्दर ढ़ंग से अदा किया जा सके। अल्लाह तआला ने भी हमें यही आदेश दिया है। जैसा कि अल्लाह का फरमान है।

فَاعْلَمْ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللَّهُ وَاسْتَغْفِرْ لِذَنْبِكَ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مُتَقَلَّبَكُمْ وَمَثْوَاكُمْ – سورة محمد- 19

अतः जान रखों कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं। और अपने गुनाहों के लिए क्षमा-याचना करो और मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों के लिए भी। अल्लाह तुम्हारी चलत-फिरत को भी जानता है और तुम्हारे ठिकाने को भी – (47- सूरः मुहम्मदः 19)

इस आयत में अल्लाह सर्वप्रथम ज्ञान प्राप्त करने का आदेश दिया है।

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) प्रति दिन फजर की नमाज़ पढ़ने के बाद यह दुआ पढ़ते थे। जैसा कि उम्मुल्मूमिनीन उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हु) वर्णन करती हैं कि नबी फजर की नमाज़ पढ़ने के बाद कहते थे। “ अल्लाहुम्मा  इन्नी अस्अलुका इल्मन नाफिआ व रिज़्क़न तैय्येबा व अमलन मुतक़ब्बला” – ऐ अल्लाह!  मैं तुम से लाभदायक ज्ञान और हलाल और पवित्र रोजी और तेरे पास स्वीकारित कर्म का प्रश्न करता हूँ। – (सुनन इब्ने माजाः 925)

यह दुआ प्रमाणित करता है कि मानव को प्रति दिन लाभदायक ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और अल्लाह से दुआ भी करना चाहिये। किसी भी चीज की जानकारी सर्व प्रथम हासिल करना चाहिये।

दुसरा वाजिबः प्रत्येस उस वस्तु से प्रेम करना जिसका आदेश अल्लाह ने दिया है।

अल्लाह ने हमें सर्व प्रथम तौहीद का आदेश दिया है। इस कारण हमें तौहीद से प्रेम करना है और तौहीद के अनुयायियों से मुहब्बत करना है। क्योंकि तौहीद के लिए अल्लाह ने हमें  दुनिया में भेजा है। तौहीद पर अमल करने से सफलता मिलेगी तो हमें तौहीद से प्रेम होना चाहिये।

तीसरा वाजिबः हम प्रत्येक कार्य के करने का पुख्ता इरादा करें जिस के करने का अल्लाह ने हमें आदेश दिया है।

और तौहीद पूर्ण आज्ञाओं में सब से प्रथम आदेश है। इस लिए तौही को पूर्ण रूप और उसकी सब क़िस्मों को साबित करने का पुख्ता इरादा रखना चाहिये और शिर्क से दूरी का इरादा रखें।

चौथा वाजिबः तौहीद के अनुसार हमारा अमल हो क्योंकि तौहीद पर हमारा पूर्ण नेक कर्म आधारित है।

हम तौहीद के अनुसार जीवन गुज़ारें, जीवन के प्रत्येक मोड़ पर तौहीद पर काइम रहें। तौहीद पर अमल करने से किसी से न डरें, किसी के घृणा करने से पीछे न हटें बल्कि अल्लाह की प्रसन्नता के कारण तौहीद पर डटे रहें और शिर्क से दूर रहें यदि आप शहीद हो जाए। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथी अबू दरदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को इसी तौहीद पर डटे रहने और शिर्क से दूर रहने की वसीयत फरमाइः

أوصاني خليلي : أن لا تشرك بالله شيئا ؛ وإن قطعت وحرقت ، ولا تترك صلاة مكتوبة متعمدا ؛ فمن تركها متعمدا؛ فقد برئت منه الذمة ، ولا تشرب الخمر ؛ فإنها مفتاح كل شر- (صحيح الجامع للشيخ الألباني: 7339)

अबू दर्दा कहते हैं कि मेरे प्रियतम ने मुझे वसीयत की, अल्लाह के साथ कुछ भी शिर्क न करो यदि तुम्हें बूटी बूटी काट दिया जाए और तुम्हें जला दिया जाए और जान बुझ कर कोइ फर्ज़ नमाज़ न छोड़ो तो जो जान बुझ कर नमाज़ छोड़ेगा तो वह अल्लाह की हिफाज़त से निकल गया और शराब न पियो क्योंकि शराब प्रत्येक प्रकार की बुराइ की जड़ है। (सही अल्-जामिअः शैख-अल्बानीः 7339)

पांचवा वाजिबः प्रत्येक कार्य को अल्लाह की खुशी के कारण करें और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सन्नत के अनुसार करें।

तौहीद को अल्लाह की प्रसन्नता के कारण प्रामाणित करें और उसके साथ तनिक बराबर भी शिर्क को शामिल न किया जाए। जिस प्रकार नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह के लिए तौहीद के प्रत्येक क़िस्मों को साबित किया, वैसे ही साबित किया जाए। क्योंकि तौहीद या अन्य नेक कर्म उसी समय अल्लाह के पास स्वीकारित है जब वह तौहीद या नेक कर्म केवल अल्लाह के लिए और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  के सुन्नत के अनुसार किया जाए।

छटां वाजिबः  हम उन वस्तुओं से दूर रहे जो तौहीद के किला में सुराख कर दे और तौहीद की दिवारों को ध्वस्त करने का कारण बने,

या तौहीद में कमी कर दे, तौहीद को अपनी विशेषताओं के साथ पूर्ण न  होने दे। बुराई और पापों से दूर रहने का शिक्षण नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  के साथी ह़ुज़ैफा बिन यमान (रज़ियल्लाह अन्हु) के कर्तव्य से मिलता है कि एक मूमिन को बुराई और पापों तथा शिर्क और बिद्अत से हमेशा चौकन्ना और होश्यार रहना चाहिये। ह़ुज़ैफा बिन यमान (रज़ियल्लाह अन्हु) कहते हैं कि लोग हमेशा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  से अच्छाई के प्रति प्रश्न करते थे और मैं हमेशा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  से बुराइयों और पापों के प्रति प्रश्न करता था कि कहीं मैं अज्ञानता के कारण बुराई के गढ़े में गिर न पड़ूँ …… (सही बुखारीः 3606)

यह हदीस हमें बुराई से दूर रहने और पापों से भयभीत रहने पर उत्साहित करता है।

सातवां वाजिबः इसी तौहीद पर जमे रहना और तौहीद पर ही हमारा निधन हो।

क्योंकि जिस व्यक्ति का निधन अच्छे कर्म करने की स्थिति में हुई तो ऐसे व्यक्ति के लिए शुभ खबर होगी और नेक कर्मों में सब से महत्वपूर्ण नेक कर्म तौहीद है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  ने फरमायाः

لقنوا موتاكم لا إله إلا الله ، فإن من كان آخر كلامه لا إله إلا الله عند الموت دخل الجنة يوما الدهر ، وإن أصابه قبل ذلك ما أصابه – صحيح الجامع للشيخ الألباني: 5150

जिस व्यक्ति के निधन का समय निकट हो तो उसे ला इलाह इल्लल्लाह पढ़ने की वसीयत करो,  क्योंकि जिस व्यक्ति के मुंह से ला इलाह इल्लल्लाह सब से अन्तिम शब्द निकेलेगा तो वह जन्नत में प्रवेश होगा यदि कुछ दिनों के बाद और यदि इस से पूर्व उसे कुछ पहुंचे। (सही अल्-जामिअः शैख-अल्बानीः 5150)

तौहीद पर जमा रहना एक मूमिन के लिए बहुत ज़रुरी है, क्योंकि अन्तिम स्थिति के अनुसार एक व्यक्ति नेक लोगों की सूची में से होगा या बुरे लोगों की सूची में होगा। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)  के साथी सुफयान (रज़ियल्लाह अन्हु) ने प्रश्न किया। ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)!  मुझे एक ऐसी बात बता दीजिये फिर आप के बाद मुझे किसी दुसरे से पुंछने की आवश्यक्ता न पड़े, तो रसूल ने फरमायाः कहो , मैं अल्लाह पर ईमान लाया और फिर उसी पर जमे रहो। (सही अल्-जामिअः शैख-अल्बानीः 4395)

जो लोग ईमान और तौहीद पर जमे रहते हैं  तो ऐसे लोगों को अल्लाह की ओर से मदद मिलती है। जैसा कि अल्लाह का फरमान है।

إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا تَتَنَزَّلُ عَلَيْهِمُ الْمَلَائِكَةُ أَلَّا تَخَافُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَبْشِرُوا بِالْجَنَّةِ الَّتِي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ- سورة فصلت: 30

जिन लोगों ने कहा कि ” हमारा रब अल्लाह है।” फिर इस पर दृढ़तापूर्वक जमें रहे, उन पर फ़रिश्ते उतरते है कि “न डरो और न शोकाकुल हो, और उस जन्नत की शुभ सूचना लो जिसका तुमसे वादा किया गया है – (41-सूरः फुस्सिलतः 30)

तौहीद के साथ साथ प्रत्येक इबादत में इन सात बातों पर अमल करना चाहिये ताकि हमारी पूर्ण इबादत स्वीकारित हो। अल्लाह हमें और आप को तौहीद पर जमे रहने की शक्ति प्रदान करे और नेक कार्य के करने की तौफीक़ दे और ईमान और नेक कर्मों पर निधन हो।   आमीन

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