कुरआन क्या है ?

शिफ़ाअत क़ुरआन और हदीस के दर्पण में

 शिफाअत के विषय को मुस्लिम समाज में बहुत कम समझने की कोशिश हुई है किसके कारण इस सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के संदेह पाए जाते हैं,शिफाअत की वास्तविकता  क्या है? दुनिया और आख़िरत में शिफाअत कब और कैसे  जाएज़ है? शिफ़ाअत की कितनी सूरतें हैं? कल क्यामत के दिन अल्लाह के रसूल की शिफ़ाअतें कैसी होंगी? और शिफ़ाअत प्राप्त करने का तरीक़ा क्या है। इन्हीं बिन्दुओं पर निम्न लेख में चर्चा की गई है।

शिफ़ाअत की परिभाषाः789

शिफाअत शफ़अ से निकला है जिसका शाब्दिक अर्थ जोड़ा के होते हैं जो एकाई का अपोज़िट है। अर्थात् एक को दो करना, तीन को चार करना आदि। और पारिभाषिक रूप में शिफ़ाअत कहते हैं: “किसी दूसरे को लाभ पहुंचाने या नुकसान से दूर रखने के लिए माध्यम बनना। (शर्ह तुम्अतुल इतिक़ाद पृष्ठ 128) शिफ़ाअत का दूसरा नाम सिफारिश भी है।

शिफ़ाअत के भेदः

शिफ़ाअत दो प्रकार की होती है।

सांसारिक कामों में सिफ़ारिशः यदि किसी व्यक्ति को सांसारिक किसी काम में सिफारिश की आवश्यकता पड़ जाती है तो इसमें कोई हरज की बात नहीं कि किसी अधिकार रखने वाले व्यक्ति से सम्पर्क करे जो उसे उसका हक़ दिला सके। इस प्रकार की सिफ़ारिश के जाएज़ होने का नियम यह है कि जिस काम के प्रति सिफ़ारिश की जा रही है वह काम वैध हो और सिफ़ारिश के कारण किसी का अधिकार नष्ट न हो रहा हो। उसी प्रकार सिफ़ारिश करने वाले के प्रति लाभ अथवा हानि पहुंचाने की आशा न रखी गई हो बल्कि उसे मात्र माध्यम समझा गया हो और इस स्थिति में भी अल्लाह पर ही उसकी आशा बंधी हुई हो।

क़्यामत के दिन की सिफारिशः जब शिफ़ाअत का शब्द प्रयोग किया जाता है तो आम तौर पर उस से अभिप्राय महा-प्रलय के दिन की सिफारिश ही होता है। यह सिफ़ारिश भी दो प्रकार की हैः

जाएज़ और वैध सिफारिश: यह वह सिफारिश है जो कल क़्यामत के दिन एक अल्लाह की इबादत करने वालों के साथ विशेष होगी। सही बुखारी की रिवायत है, एक दिन अबु हुरैरा रज़ि. ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा था: من أسعد الناس بشفاعتك؟  वह कौन भाग्यशाली हैं जिन को आपकी शिफ़ाअत का सौभाग्य प्राप्त होगा? आपने कहाः من قال لا اله الله خالصا من قلبه  “जिसने सच्चे दिल से गवाही दी कि अल्लाह के अलावा और कोई सच्चा इबादत के योग्य नहीं वह मेरी सिफारिश का हकदार होगा.”

शिफ़ाअत की शर्तें: यह सिफारिश भी हर व्यक्ति को प्राप्त नहीं हो सकती बल्कि इसके लिए तीन शर्तों का पाया जाना अत्यंत आवश्यक है, वह तीन शर्तें क्या हैं * सिफ़ारिश करने वाले से अल्लाह खुश हो * जिसके लिए सिफारिश की जा रही है उसके अमल से भी अल्लाह खुश हो * सिफारिश करने वाले को सिफारिश करने की अनुमति दी जाए.

 इन तीन शर्तों का वर्णन अल्लाह ने सूरः अल-नजम आयत नम्बर 26 में इस इस प्रकार किया हैः     फ़रमाया:

وَكَمْ مِنْ مَلَكٍ فِي السَّمَاوَاتِ لَا تُغْنِي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئًا إِلَّا مِنْ بَعْدِ أَنْ يَأْذَنَ اللَّهُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيَرْضَى  سورة النجم آية 26

बहुत से फरिश्ते (स्वर्गदूत) आसमानों में हैं जिनकी सिफारिश कोई लाभ नहीं दे सकती, लेकिन यह दूसरी बात है कि अल्लाह जिसे सिफारिश करने की अनुमति दे, और उसके कर्म से राज़ी भी हो।

दूसरे स्थान पर अल्लाह ने फरमायाः

 يَوْمَئِذٍ لَا تَنْفَعُ الشَّفَاعَةُ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرَّحْمَٰنُ وَرَضِيَ لَهُ قَوْلًا

उस दिन शिफ़ाअत कुछ काम न आएगी मगर जिसे रहमान हुक्म दे और उसकी बात को पसंद फरमाए। (सूरः ताहा 109) और सूर अंबिया (आयत न.28) में अल्लाह ने फ़रमायाः

 وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَىٰ 

और वह किसी की भी सिफ़ारिश नहीं करते सिवाए उनके जिन से अल्लाह ख़ुश हो।

जाएज़ शिफ़ाअत की क़िस्में

वैध और जाएज़ श़िफाअत दो प्रकार की होती है: सामान्य सिफारिश और विशेष सिफारिश, सामान्य सिफारिश का मतलब है कि कल महा-प्रलय के दिन अल्लाह की अनुमति से उसके नेक बन्दे को सिफारिश करने का हक़ हासिल होगा, जो ऐकेश्वरवादियों के लिए सिफारिश करेंगे, इस में रसूल भी हैं, नबी भी हैं, सिद्दीकीन भी हैं और अल्लाह के रास्ते में शहादत पाने वाले भी हैं। उसी प्रकार उस दिन क़ुरआन अपने पढ़ने वाले के हक में सिफ़रिश करेगा। रोज़ा सिफ़ारिश करेगा, और छोटी आयु में मरने वाले बच्चे अपने माता पिता के हक़ में सिफ़ारिश करेंगे।

नबी सल्ल. की शिफ़ाअतः

पहली शिफ़ाअतः सिफारिश की दूसरी क़िस्म जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ विशेष है, उनमें सबसे पहले  शिफ़ाअते उज़्मा (सर्वोच्च शिफ़ाअत) है जो क़्यामत के दिन होगी…याद कीजिए उस दिन को जब सारी सृष्टि हश्र के मैदान में उपस्थित होगी, जहां हर व्यक्ति को स्यवं की चिंता होगी। उस दिन की परेशानी इतकी कठिन होगी कि लोग पसीनों में डूबे हुए होंगा, जब उन से रहा न जाएगा तो भाग कर संदेष्टाओं के पास जाएंगे, सब से पहले हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के पास आएंगे, और उनसे अनुरोध करेंगे कि आप इनसानों के बाप हैं , अल्लाह ने आपको अपने हाथ से पैदा किया, और अपनी ओर से विशेषता के साथ आपमें अपनी आत्मा फूंकी, फरिशतों को आदेश दिया जिन्हों ने आपको सज्दा किया इस लिए अल्लाह के पास हमारे लिए सिफ़ारिश कीजिए, आप देख रहे हैं कि हम सब की कैसी स्थिति हो चुकी है। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम कहेंगेः मेरा रब आज अति क्रोधित है कि इस से पहले इतना क्रोधित कभी नहीं हुआ था और न आज के बाद इतना क्रोधित कभी होगा। और मेरे रब ने मुझे वृक्ष से रोका था लेकिन मैंने उसकी अवज्ञा की, नफ़्सी नफ़्सी नफ़्सी (मुझको अपनी चिंता है) तुम किसी अन्य के पास जाओ, हां हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के पास जाओ। अतः सब लोग हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित होंगे, और अनुरोध करेंगेः ऐ नूहः आप सब से प्रथम संदेष्टा हैं जो धरती वालों की ओर भेजे गए और आपको अल्लाह ने शुक्रगुज़ार बन्दा की उपाधि दी। आप ही हमारे लिए अपने रब के पास शिफ़ाअत कर दें। क्या आप देखते नहीं कि हम किस स्थिति को पहुंच गए हैं ? हज़रत नूह अलैहिस्सलाम भी कहेंगे कि मेरा रब आज इतना क्रोधित है कि इस से पहले कभी इतना क्रोधित नहीं था और न आज के बाद इतना क्रोधित होगा, और मुझ से एक दुआ के स्वीकार करने का वादा किया गया था जो मैंने अपनी क़ौम के ख़िलाफ कर ली थी, नफ़्सी नफ़्सी नफ़्सी (मुझको अपनी चिंता है)  तुम मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास जाओ, हां हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास जाओ। अतः सब लोग हज़रत  इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित होंगे, और अनुरोध करेंगेः ऐ इब्राहीम! आप अल्लाह के नबी और ख़लील हैं, धरती पर चयन किए हुए अल्लाह के संदेष्टा…,आप हमारी सिफ़ारिश कीजिए, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम कहेंगेः मेरा रब आज इतना क्रोधित है कि इस से पहले कभी इतना क्रोधित नहीं था और न आज के बाद इतना क्रोधित होगा, मैंने तीन झूठ बोले थे। नफ़्सी नफ़्सी नफ़्सी (मुझको अपनी चिंता है)  तुम मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास जाओ, हां हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास जाओ। लोग हज़रत  मूसा अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित होंगे, और अनुरोध करेंगेः ऐ मूसा आप अल्लाह के रसूल हैं, अल्लाह ने आपको अपनी रिसालत प्रदान की और आप से बात की, आप हमारी शिफाअत हमारे रब के पास करें, आप देख ही रहे हैं कि हम किस हालत को पहुंच चुके हैं। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम कहेंगेः आज अल्लाह तआला बहुत क्रोधित है वह न पहले कभी हुआ था और न आज के बाद कभी होगा मैं ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी हालांकि अल्लाह की ओर से मुझे उसका आदेश नहीं मिला था, नफ़्सी नफ़्सी नफ़्सी (मुझ को आज अपनी ही पड़ी है)  मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास जाओ, हां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के पास जाओ, सब लोग हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की सेवा में उपस्थित होंगे और अनुरोध करेंगेः ऐ ईसा! आप अल्लाह का कलिमा हैं जिसे अल्लाह ने मर्यम अलैहिस्सलाम पर डाला था और अल्लाह की ओर से आत्मा हैं, आपने बाल्यावस्था में मां की गोद में ही लोगों से बात की थी, हमारी शिफ़ाअत कीजिए, आप देख रहे हैं कि हमारी क्या हालत हो चुकी है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी कहेंगे कि आज मेरा रब बहुत क्रोधित है वह न पहले कभी हुआ था और न आज के बाद कभी होगा और आप किसी किसी गलती का वर्णन न करेंगे।मात्र इतना कहेंगेः नफ़्सी नफ़्सी नफ़्सी (मुझे आज अपनी ही पड़ी है) मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के पास जाओ, हाँ मुहम्मद सल्ल. के पास जाओ, सब लोग मुहम्मद सल्ल. के पास उपस्थित होंगे और अनुरोध करेंगेः ऐ मुहम्मद! आप अल्लाह के रसूल और अन्तिम संदेष्टा हैं और अल्लाह ने आपके अगले पिछले प्रत्येक पाप क्षमा कर दिए हैं। अपने रब की सेवा में हमारे लिए सिफ़ारिश कीजिए, आप स्वयं देख रहे हैं कि हम किसी हलत को पहुंच चुके है। हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने  फरमाया कि अततः मैं आगे बढ़ूंगा और अर्श के पास पहुंच कर अपने रब के लिए सज्दा में गिर पड़ूंगा, फ़िर अल्लाह तआला मुझ पर अपनी हम्द और तारीफ़ के रवाज़े खोल देगा कि मुझ से पहले किसी को हम्द करने के वह तरीक़े न बताए थे, फ़िर कहा जाएगाः ऐ मुहम्मद! अपना सर उठाइए, मांगिए, आपको दिया जाएगा, शिफ़ाअत कीजिए आपकी शिफ़ाअत स्वीकार की जाएगी। अब मैं अपना सर उठाऊंगा और अनरोध करूंगाः ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत, ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत। ऐ मेरे रब! मेरी उम्मत ( पर दया कर)। ….(सही बुख़ारी)

इसी के बाद सारे लोगों के बीच फैसला शुरू हो जाएगा। इसी को शिफाअते उज़्मा कहते हैं।         

दूसरी शिफाअतः आप सल्ल. की दूसरी शिफ़ाअत से अल्लाह के सत्तर हज़ार नेक बन्दे बिना हिसाब किताब के जन्नत में प्रवेश करेंगे। जैसा कि सही मुस्लिम में उकाशा बिन मुहसिन रज़ि. की हदीस से प्रमाणित है।

तीसरी शिफ़ाअतः आप सल्ल. की तीसरी शिफ़ाअत जन्नतियों के लिए जन्नत में प्रवेश करने के लिए होगी। अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः मैं क्यामत के दिन जन्नत के द्वार पर आऊंगा और उसे खोलने का अनुरोध करूंगा, पूझा जाएगाः आप कौन हैं ? आप सल्ल. फरमाएंगेः मुहम्मद, अतः जन्नत का दारोग़ा कहेगाः आप ही के लिए आदेश हुआ है, आप से पहले किसी के लिए नहीं खोल सकता। (सही मुस्लिम)

चौथी शिफ़ाअतः महा-पाप करने वालों के लिए नरक से मुक्ति की शिफ़ाअतः यह वह लोग होंगे जो अपने पापों के परिणाम-स्वरूप नरक में प्रवेश कर चुके होंगे परन्तु अल्लाह के साथ किसी अन्य को भागीदार न ठहराए होंगे तो ऐसे पापियों को अल्लाह के रसूल सल्ल. की सिफ़ारिश द्वारा नरक से निकाल कर स्वर्ग में दाख़िल कर दिया जाएगा।

पांचवी शिफ़ाअतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पांचवी सिफारिश अपने चाचा अबू तालिब की सजा में कमी के लिए होगी जिसने दावत के हर मोड़ पर आपकी सहायता की थी, आपकी सिफ़ारिश से उसे नरक के ऊपरी भाग में कर दिया जाएगा, आग के अंगारे उनके दोनों टख़नों तक पहुंच रहे होंगे जिसकी गर्मी से दिमाग़ खौल रहा होगा। (बुखारी,मुस्लिम)

छठ्ठी शिफ़ाअतः उन लोगों के लिए होगी जिनको जहन्नम में जाने का आदेश हो चुका होगा लेकिन आप सल्ल. की शिफ़ाअत से उनको जन्नत में प्रवेश करने की अनुमति दे दी जाएगी।

सातवीं शिफ़ाअतः आप सल्ल.की पवित्र दुआओं द्वारा अल्लाह के कुछ नेक बन्दों के दरजात बुलंद किए जाएंगे।

नाजाएज़ सिफारिशः

शिफ़ाअत की दूसरी क़िस्म अवैध और गलत सिफारिश है, अर्थात् वह सिफारिश जिकसी आशा गैर-मुस्लिम अपने भगनानों और देवताओं के प्रति रखते हैं, या दरगाहों के पुजारी अपने पक्ष में औलियाए किराम के प्रति रखते हैं, औऱ यह समझते हैं कि उनकी अल्लाह के पास पहुंच हैं वह अल्लाह के पास हमारे सिफारशी हैं, तो वास्तव में यह उनकी ग़लतफ़हमी है, नादानी और अज्ञानता है. मक्का के कुफ्फ़ार भी ऐसी ही आस्था रखते थे लेकिन उनकी यह आस्था उनके कोई काम न आ सकी। अल्लाह ने फरमायाः

وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لا يَضُرُّهُمْ وَلا يَنْفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَؤُلاءِ شُفَعَاؤُنَا عِنْدَ اللَّهِ – سورة يونس 18

और यह लोग अल्लाह के अतिरिक्त ऐसी चीज़ों ती पूजा करते हैं जो न उनको हानि पहुंचा सकें और न उनको लाभ पहुंचा सकें और कहते हैं कि यह अल्लाह के पास हमारे सिफ़ारशी हैं।   

क्योंकि अल्लाह और बन्दे के बीच कोई गैप, कोई डीस्टेनस और कोई दूरी नहीं. वह न दुनिया में उनके कुछ काम आएंगे और न मरने के बाद कल महा-प्रलय के दिन. कुछ काम आ सकेंगे। अल्लाह ने फ़रमायाः

 فَمَا تَنْفَعهُمْ شَفَاعَة الشَّافِعِينَ ) سورة الأعراف 53)

 “उस दिन सिफारिश करने वालों की सिफारिश उन्हें कोई फायदा न पहुँचा सकेगी”.) सूरः अल-आराफ़ 53)

शिफ़ाअत कैसे प्राप्त हो सकती है ?

अगर हम कल क्यामत के दिन शिफ़ाअत चाहते हैं तो हमें कुछ काम करने होंगे। जिन में सब से पहले

  • तौहीद पर जम जाना, मात्र एक अल्लाह को हर प्रकार के लाभ एवं हानि का अधिकार समझना, उसकी इबादत में किसी अन्य को भागीदार न बनाना।
  • उसी प्रकार क़ुरआन करीम की तिलावत करना भी शिफ़ाअत का सबब है जो अपने पढ़ने वाले के लिए अल्लाह की सेवा में शिफ़ाअत करेगा। (सही मुस्लम)
  • रोज़ा का भी ज्यादा से ज्यादा इहतमाम करना चाहिए कि रोज़ा भी एक व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश करेगा।
  • उसी तरह आप सल्ल.पर दरूद भेजते रहें, आप सल्ल. ने फरमायाः जो व्यक्ति सुबह और शाम दस दस बार मुझ पर दरूद पढ़ता है उसको क्यामत के दिन मेरी शिफ़ाअत प्राप्त होगी।
  • नमाज़े जनाज़ा में सही अक़ीदा रखने वालों की भागीदारी भी शफ़ाअत का सबब बनेगी। अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमायाः जिस मुसलमान मृतक के जनाज़े की नमाज़ में चालीस ऐसे लोग शरीक होते हैं जो अल्लाह के साथ शरीक नहीं ठहराते तो अल्लाह उनकी शिफ़ाअत स्वीकार करता है। (सही मुस्लिम)
  • उसी प्रकार अधिस से अधिक नफ़िल नमाज़ों का एहतमाम करना भी शिफ़ाअत का सबब है। रबीआ बिन काब अस्लमी ने जब अल्लाह के रसूल सल्ल. से अपनी इच्छा बयान की कि जन्नत में अपकी संगत का अनुरोध करता हूं तो आपने फरमाया थाः अपनी इस इच्छा की पूर्ति के लिए अधिक से अधिक सज्दों (नफ़िल नमाजों) द्वारा मेरे सहायता करो।  (सही मुस्लिम).

 इन्हीं कुछ शब्दों के साथ हम आपसे विदा होते हैं यह दुआ करते हुए कि अल्लाह पाक हम सब को प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिफ़ाअत प्रदान करे, आमीन।

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