कुरआन क्या है ?

पांच उपदेश

यह पांच उपदेश आपके जीवन में परिवर्तन लाने के लिए काफी हैं

यह पांच उपदेश आपके जीवन में परिवर्तन लाने के लिए काफी हैं

निम्म में हम पांच उपदेश आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं जो  संसार के सबसे सच्चे और पवित्र व्यक्ति विश्व नायक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रवचन पर आधारित है, हमे आशा है कि इसे पढ़ कर स्वयं इस पर अमल करेंगे और अपने परिवार के सदस्य तथा मित्रों को भी इस पर अमल करने की ताकीद करेंगेः

हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि एक दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने साथियों को संबोधित करते हुए कहा कि:

مَنْ يَأْخُذُ مِنْ أُمَّتِي خَمْسَ خِصَالٍ ، فَيَعْمَلُ بِهِنَّ ، أَوْ يُعَلِّمُهُنَّ مَنْ يَعْمَلُ بِهِنَّ ؟ قَالَ : قُلْتُ : أَنَا يَا رَسُولَ اللهِ ، قَالَ : فَأَخَذَ بِيَدِي فَعَدَّهُنَّ فِيهَا ، ثُمَّ قَالَ : اتَّقِ الْمَحَارِمَ تَكُنْ أَعْبَدَ النَّاسِ ، وَارْضَ بِمَا قَسَمَ اللهُ لَكَ تَكُنْ أَغْنَى النَّاسِ ، وَأَحْسِنْ إِلَى جَارِكَ تَكُنْ مُؤْمِنًا ، وَأَحِبَّ لِلنَّاسِ مَا تُحِبُّ لِنَفْسِكَ تَكُنْ مُسْلِمًا ، وَلاَ تُكْثِرِ الضَّحِكَ ، فَإِنَّ كَثْرَةَ  الضَّحِكِ تُمِيتُ الْقَلْبَ.

أخرجه الترمذي (4/551 ، رقم 2305) ، وقال : غريب ، قال الشيخ الألباني : ( حسن ) انظر حديث رقم : 100 في صحيح الجامع.

कौन है जो मुझ से यह शब्द सीखे फिर उन को अपने व्यवहार में लाए या जो लाने वाला हो उसे सिखाए? हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! मैं इस के लिए तैयार हूं। अतः आप ने मेरा हाथ पकड़ा और पांच शब्द सुनाते हुए कहा:

हराम काम करने से बचो, सबसे बढ़ कर इबादतगुज़ार बन जाओगे, अल्लाह ने तुम्हें जो दे रखा है उस से खुश रहो लोगों में सबसे बढ़ कर धनी बन जाओगे, अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो ईमान वाले बन जाओगे, जो अपने लिए पसंद करते हो वही दूसरों के लिए भी पसंद करो मुसलमान बन जाओगे, और अधिक हंसने से परहेज़ करो क्योंकि अधिक हँसी दिल को मृत कर देती है। (सही तिर्मिज़ी: 2305 हसन)

व्याख्या:

उपर्युक्त हदीस में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का हाथ थाम कर पांच बहुत व्यापक नसीहतें कीं:

पहली नसीहत: اتَّقِ المحارمَ تَكن أعبدَ النَّاسِ 

हराम कामों से बचो सबसे बढ़ कर इबादतगुज़ार बन जाओगे, और हराम काम वे सारे काम हैं जिनसे अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मना किया है और उसके करने वालों के लिए सज़ायें निर्धारित की हैं और जो बंदा खुद को हराम कामों से बचा लेगा वह वास्तव में इबादतगुज़ार है। मानो हराम से रुकना ही वास्तविक इबादत है। आजकल कितने लोग नमाज़ रोज़ा के बड़े पाबंद होते हैं लेकिन जीवन बीमा जैसे ब्याज का कारोबार बहुत साहस से कर रहे होते हैं, हदीस की रोशनी में ऐसे लोग इबादतगुज़ार नहीं, अब सवाल यह है कि हम हराम कामों से कैसे बचें?

तो इसके लिए पहले नंबर पर हमारे अंदर ईमानदारी हो और अल्लाह की निगरानी का एहसास पाया जाए कि जब अल्लाह की निगरानी का एहसास हो तो उसी के सामने उसकी ग़ैरत को चुनौती देने का साहस नहीं कर सकेंगे। दूसरे नंबर पर हम यह जानें कि पाप के भी एक व्यक्ति के जीवन में और समाज पर गहरे प्रभाव पड़ते हैं। जैसे पाप के कारण बुद्धि में कमजोरी आती है, बुराई करने में साहस और नेक कामों में सुस्ती आती है, उसी प्रकार दिल में तंगी पैदा हो जाती है। तीसरे नंबर पर शैतान की मक्कारियों और उसके गुमराह करने के रास्तों की जानकारी कि शैतान इनसान को गुमराह करने के लिए विभिन्न मार्गों से आता है, कभी आंख के रास्ते से, कभी ज़ुबान के रास्ते से, कभी कान के रास्ते से, कभी गुप्तांग के रास्ते से तो कभी हाथ पैर के रास्ते से आता है।

दूसरी नसीहत: وارضَ بما قسمَ اللَّهُ لَكَ تَكن أغنى النَّاسِ 

अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो तय कर दिया है उस से संतुष्ट रहो लोगों में सबसे धनी बन जाओगे, संतोष बहुत बड़ी नेमत है, अल्लाह ने जितना प्रदान किया क्या है उस पर राज़ी रहने वाला और लोगों के धन सम्पत्ति से बेनियाज़ रहने वाला बहुत बड़ा धनी है। वास्तविक धनवान वह नहीं है जो पैसे और सम्पत्ति का मालिक हो बल्कि बह है जो दिल का धनी है। तब ही तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

لیس الغنی عن کثرۃ العرض ولکن الغنی غنی النفس۔

धनवान वह नहीं है जिसके पास धन सम्पत्ति अधिक हो बल्कि वास्तविक धनवान वह है जो दिल की धनी है। आप पूछ सकते हैं कि सम्पत्ति से वंचित रहने के बावजूद हम दिल के धनी कैसे बनें? तो इसका सबसे अच्छा तरीक़ा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें बता दिया है कि हम अपने से नीचे वालों की ओर देखें, अपने से ऊपर वालों को न देखें। अपने से नीचे वालों की दुर्दशा को देखें कि कुछ लोग सालों से मृत्युशय्या पर पड़े हुए हैं, कुछ लोग एक दिन की रोटी के लिए भी तरस रहे हैं। अपने से नीचे वालों को देखने से आपके अंदर नियाज़ी पैदा होगी, इसी लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:

أنظروا الی من ھو أسفل منکم ولا تنظروا الی من ھو فوقکم فانہ أجدر أن لا تزدروا نعمة اللہ علیکم -بخاری ومسلم

“उन लोगों को देखो जो तुम से नीचे हैं उन लोगों को मत देखो जो तुम से ऊपर हैं क्योंकि यह अधिक उपयुक्त है कि तुम अल्लाह के उपकारों को तुच्छ न समझो “(बुखारी, मुस्लिम)

तीसरा नसीहत: وأحسِن إلى جارِكَ تَكُن مؤمنًا

अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो ईमान वाले बन जाओगे। इस्लाम ने पड़ोसियों के साथ अच्छे व्यवहार की बहुत ताकीद की है, बुखारी व मुस्लिम की रिवायत है अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

مازال جبریل یوصینی بالجار حتی ظننت أنہ سیورثہ۔

जिब्रील अमीन मुझे पड़ोसियों के अधिकार के संबंध में ताकीद करते रहे यहां तक कि मैं समझने लगा कि शायद उसे मेरा वारिस बना दिया जाएगा।

पड़ोसियों के मूल अधिकार यह हैं कि उन्हें कोई कष्ट न पहुंचाया जाए, यदि वह कष्ट पहुंचाते हैं तो इसे सहन किया जाए। उसकी हालत की खबर रखी जाए और उसकी जरूरत पूरी की जाए। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः

ما آمن بی من بات شبعان وجارہ جائع الی جنبہ وھو یعلم۔

वह मुझ पर ईमान वाला नहीं जो पेट भर कर रात बिताए और उसका पड़ोसी उसके पहलू में भूखा हो जिसे वह जान रहा हो। उसी तरह पड़ोसी के रहस्यों की रक्षा की जाए और उसके शुभचिंतक बने रहें।

चौथी नसीहत: وأحبَّ للنَّاسِ ما تحبُّ لنفسِكَ تَكن مسلِمًا

जो अपने लिए पसंद करते हो वही दूसरों के लिए भी पसंद करो मुसलमान बन जाओगे, यह बहुत ही व्यापक वसीयत है कि मुस्लिम समाज का हर व्यक्ति दूसरे के लिए शुभचिंतक हो, जो अच्छाई और भलाई अपने लिए पसंद करता है वही अच्छाई और भलाई अपने भाई के लिए भी पसंद करे और जिस बुराई को अपने लिए नापसंद करता है उस बुराई को दूसरे के लिए भी नापसंद करे। और जो व्यक्ति इस  विशेषता से सुसज्जित हो जाए वही असली मुसलमान है। इसी बिंदु को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बयान करने के लिए कभी सारे मुसलमानों को शरीर के विभिन्न अंगों से उपमा दी जिसका एक अंग बीमार होता है तो सारे अंग बुखार और अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं। और कभी इमारत के विभिन्न ईंटों से उपमा दी कि उसकी एक ईंट दूसरी ईंट को बल देती है।

पांचवें नसीहत: ولا تُكثرِ الضَّحِكَ فإنَّ كثرةَ الضَّحِكِ تميتُ القلبَ

और अधिक हंसने से परहेज़ करो क्योंकि अधिक हँसी दिल को मृत कर देती है। हंसी मनुष्य की विशेषता है, जानवर नहीं हंसते, क्योंकि हँसी किसी बिंदु को समझने के आधार पर ही आती है। और इस्लाम एक स्वभाविक धर्म है इसलिए उसने हँसने की अनुमति दी है। अल्लाह के नबी जीवन की पवित्र जीवनी हमारे लिए आदर्श है जिन्होंने विभिन्न स्थानों पर हंसा और मनोरंजन किया है। एक बार की घटना है हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास थी, हज़रत सौदा रज़ियल्लाहु अन्हा भी वहीं पर बैठी थीं, मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए हरीरह (खाने का एक आइटम) बनाई, और ले कर आई तो सौदा से कहा: तुम भी खाओ, उसने कहा: मैं पसंद नहीं करती। मैंने कहा: खाओगी वरना मुंह पर लीप दूंगी। उसने कहा: मैं नहीं खा सकती। मैंने हरीरह से हाथ में लिया और उसके मुंह पर मल दिया। अल्लाह के रसूल उसके और मेरे बीच बैठे थे। आपने अपनी पिंडली हटाई ताकि सौदा मुझ से बदला ले सके, यह देख कर मैंने खुद थाली में से कुछ हरीरह अपने हाथ में लिया और अपने चेहरे पर मल लिया। यह देखकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हंसने लगे।

कहने का अर्थ यह है कि हदीस में जो हँसना निषेध किया गया है उससे अभिप्राय मात्र हंसी नहीं है बल्कि उसका अभिप्राय ज़्यादा से ज़्यादा हंसना है, क्योंकि कोई चीज़ अपनी सीमा से निकल जाती है तो वह नींदनीय ठहरती है।

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