कुरआन क्या है ?

समाज सुधार का काम करते रहिए

भलाईविश्य नायक मुहम्मद सल्ल. हमारी भलाई और शुभचिंतन के हमेशा इच्छुक रहते थे, दिन रात उन्हें यही चिंता सिता रही होती कि कैसे लोग दुनिया और आख़िरत में सफल हो जाएं, इस लिए जब अल्लाह की ओर से प्रकाशना उतरती और कोई संवेदनशील मामला होता तो उसी समय मिम्बर पर चढ़ते और सहाबा को संबोधित करते हुए परिस्थिति से अवगत करते थे। ऐसी ही एक घटना अम्मा आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं, वह कहती हैं कि एक दिन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमारे पास आए, मैं ने उनके चेहरे से भांप लिया कि कोई खास बात ज़रूर है, आपने वुज़ू किया, किसी से कोई बात नहीं की और (घर से) निकल गये, (मस्जिद गये) मैंने दीवार से कान लगा लिया ताकि आप जो कुछ फ़रमाना चाहते हैं उसे सुन सकूँ। आप मिम्बर पर बैठे, और अल्लाह की स्तुति और प्रशंसा के बाद कहा:

 يا أيُّها النَّاسُ إنَّ اللهَ تبارَك تعالى يقولُ لكم: مُرُوابالمعروفِ وانهَوْا عن المنكَرِ قبْلَ أنْ تدعوني فلا أجيبَكم وتسألوني فلا أُعطيَكم وتستنصروني فلا أنصرَكم  (صحيح ابن حبان: 290

“ऐ लोगो! अल्लाह तुम्हें कहता है कि भलाई का आदेश दो और बुराई से रोको, इस से पहले कि तुम दुआ करो और मैं तुम्हारी दुआ स्वीकार न करूं, मुझ से सवाल करो और मैं तुम्हारा सवाल पूरा न करूँ और तुम मुझ से मदद मांगो और मैं तुम्हारी मदद न करूं”।

आप ने इसके अलावा और कुछ नहीं कहा और मिम्बर से उतर आए। (सही इब्ने हिब्बान: 290)

भाइयो! कल्पना करो कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम घबराये हुए मस्जिद में आये ताकि सहाबा को सम्बोधित करें लेकिन आपने लंबी-चौड़ी बात नहीं कही बल्कि मात्र अल्लाह का संदेश सुना दिया कि यदि तुम भलाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना छोड़ दोगे तो तुम्हारे रब का दरवाजा तुम्हारे चेहरे पर बंद कर दिया जाएगा, अब तुम लाख दुआ करो, मांगो, सवाल करो लेकिन तुम्हारी दुआ और सवाल पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, और तुम्हारी कोई सहायता न हो सकेगी। तो भाइयो हमें समझ में आया कि हमारी दुआयें स्वीकार क्यों नहीं हो रही हैं और हमारी वास्तविक बीमारी क्या है? बल्कि मात्र यह नहीं कि दावत से मुंह मोड़ने के कारण हमारी दुआयें स्वीकार नहीं की जाएंगी और बस बल्कि यह तो हमारी हिलाकत का भी सबब है।

सही बुख़ारी की रिवायत है हज़रत नुमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाः

अल्लाह की सीमा  में कोताही करने या उसमें जा पड़ने वाले का उदाहरण उस समुदाय के समान है जो नाव में बैठो और चिट्ठी डाल कर कुछ तो जहाज के नीचले भाग में चले गये, और बाक़ी ऊपर वाले भाग में। अब नीचे वाले पानी लेकर ऊपर वालों के पास से गुजरते हैं, जिससे ऊपर वालों को तकलीफ होती है। इसलिए नीचे वालों में से एक ने कुल्हाड़ी पकड़ा और जहाज़ के पैंदे में छेद करना शुरू किया। इस पर ऊपर वाले उनके पास गए (और कहा) कि (तुम) यह क्या (कर रहे हो)?  तो उसने जवाब दिया: मेरे ऊपर आने की वजह से आप लोगों को बेचैनी महसूस होती है और मुझे पानी की हर हालत में जरूरत है। इसलिए अगर यह ऊपर वाले उसका हाथ पकड़ लेंगे और उस हरकत से उसे रोक देंगे तो उसे भी और स्वयं को भी विनाश से बचा लेंगे, लेकिन अगर वह उसे उसके हाल पर छोड़ देंगे तो खुद भी डूबेंगे और उसे भी ले डूबेंगे। ”

इस तरह जरूरी है कि समाज में जो बुराइयां पनप रही हैं उन से रोकने वाले लोग पाये जाते हों, वरना अगर नाव डूबी तो डूबेंगे सारे, और अगर दावत का काम जारी रहा तो हम अल्लाह के अज़ाब से सुरक्षित रहेंगे। अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ الْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ ﴿هود: 117

“तुम्हारा रब तो ऐसा नहीं है कि बस्तियों को अकारण विनष्ट कर दे, जबकि वहाँ के निवासी बनाव और सुधार में लगे हों।”

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