कुरआन क्या है ?

सांसारिक नियमों में ज़कात का महत्व

लेखकः  सफात आलम तैमी मदनी  Zakat1

अल्लाह ने रोज़ी का वितरण अपने हाथ में रखा है, कुछ लोगों को अधिक से अधिक दिया तो कुछ लोगों को कम से कम, हर युग में और हर समाज में मालदारा और गरीब दोनों का वजूद रहा है, सवाल यह है कि आखिर अल्लाह ने अमीरी और गरीबी की कल्पना क्यों रखा? इसका उत्तर यह है कि ऐसा अल्लाह ने बहुत बड़ी तत्वदर्शिता के अंतर्गत किया।  ताकि एक वर्ग दूसरे वर्ग के काम आ सके, प्रत्येक की जरूरत दूसरे से पूरी होती रहे। अल्लाह ने फरमायाः “और एक को दूसरे पर प्रधानता प्रदान किया ताकि तुम्हें आज़माए उन चीज़ों में जो तुम को दी है. (सूरः अनआन 165) मान लें कि यदि सभी लोग मालदार हो जाते तो लोगों का जीवन बिताना मुश्किल होता, एक का काम दूसरे से हासिल नहीं हो सकता था, और हर एक दूसरे पर आगे बढ़ने की कोशिश करता,  इस प्रकार देश और समाज का विनाश होता. जबकि लोगों के स्तर में अंतर होने के कारण अल्लाह ने जिसे कम दिया है उसे कल क़ियामत के दिन यदि वह ईमान वाला रहा तो वहां की नेमतों से मालामाल करने का वादा किया है। उसी तरह गरीबों को कुछ ऐसे गुणों और हार्दिक शान्ति प्रदान की है कि मालदारों का दामन उस से खाली है। इसके साथ साथ अल्लाह ने उनके प्रति लोगों के मन में दया-भाव, शुभचिंतन, सहानुभूति की भावना पैदा की, फिर मालदारों को गरीबों पर खर्च करने का आदेश दिया, और उनके मालों में गरीबों का अधिकार ठहराया। अल्लाह तआला ने फरमायाः अल्लाह के माल में से तुम उन्हें दो जो उसने तुम्हें दिया है। पता यह चला कि इंसान के पास जो कुछ है उसका अपना नहीं है बल्कि अल्लाह का दिया हुआ है, इस लिए यदि मनुष्य कुछ पैसे अल्लाह के रास्ते में खर्च करता है तो उसे इस पर गर्व का कोई अधिकार नहीं है।

लेकिन यहां अल्लाह की रहमत देखें कि अल्लाह ने माल का सारा अधिकार मानव से छीन नहीं लिया अगर ऐसा होता तो मनुष्य के अंदर कोशिश करने की भावना नहीं रहती, खोज-परख की शक्ति बाकी नहीं रहती. और वह हर्ष व उल्लास न रहता जो इंसान को अपनी कोशिश का नतीजा देख कर प्राप्त होता है. अगर यह भावना मनुष्य से छीन ली जाए तो इंसान के अंदर अपने माल को विकसित करने की चिंता नहीं रहेगी, उसके जीवन का जोश और उत्साह ठंडा पड़ जाएगा।

यही दृष्टिकोण पैदा हुआ था रूस में समाजवाद के नाम से कि उत्पादन जनता की संयुक्त संपत्ति है, जिसमें सब को बराबर का हिस्सा मिलेगा, कमाई किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होगी …. फिर क्या हुआ?  कुछ वर्षों के बाद यह व्यवस्था स्वयं अपनी मौत मर गई और संसार में उसका नाम व निशान भी न रहा।

इस प्रणाली की तुलना में एक और प्रणाली आयी जिसका नाम दुनिया ने पूंजीवाद रखा, इस प्रणाली ने व्यक्ति को उत्पादन का ऐसा मालिक बना दिया जिस में दोसरों का कण बराबर भी अधिकार नहीं रखा गया. यही वह प्रणाली है जो पूरी दुनिया में आज प्रचलित है, इस प्रणाली के कारण कुछ लोगों की मुट्ठी में दुनिया की दौलत घूम रही है, लोग वैध और अवैध की परवाह किए बिना पैसे इकट्ठा कर रहे हैं, यहाँ एक वर्ग मालदार से मालदार तर होता जा रहा है तो दुसरा वर्ग गरीब से गरीब तर होता जा रहा है. इसलिए आज दनिया इस प्रणाली से थक चुकी है और इसके विरोध  दुनिया के कोने कोने में प्रति दिन विरोध हो रहा है।

इन दोनों के बीच इस्लाम ने जो तीसरी प्रणाली दी वह अति उचित प्रणाली है कि न तो एक व्यक्ति की कमाई को सरकार की संपत्ति ठहराया कि सब को उसमें समान अधिकार मिले न मनुष्य को अपनी कमाई पर यूं सांप बना कर बैठा दिया कि उसमें किसी अन्य का कोई अधिकार ही न हो। इस्लाम ने प्राकृतिक व्यवस्था यह दिया कि इंसान अपनी मेहनत से जो कुछ कमाता है वह उसी की संपत्ति है लेकिन उसके माल में समाज के गरीबों और निर्धनों का भी अधिकार है। यदि उसकी सम्पत्ति इस्लाम की निर्धारित मात्रा को पहुंच रही है तो नमाज़ रोज़े के समान उस पर जरूरी है कि अपने माल से एक साधारण मात्रा में गरीबों के लिए निकाले …. इसी को इस्लाम की शब्दावली में ज़कात कहा जाता है।

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