कुरआन क्या है ?

रमज़ान में कुछ पुण्य के काम

 रमज़ान के काम

रोज़ा रखनाः

रमज़ान के कामों में सब से उत्तम काम रोज़ा रखना हैः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

من صام رمضان إيماناً و احتساباً غفر له ما تقدم من ذنبه    رواه البخاري ومسلم

” जिसने ईमान और सवाब की नीयत से रमज़ान के रोज़े रखा उसके प्रत्येक पिछले गुनाह क्षमा कर दिए जायेंगे।”(बुख़ारी,मुस्लिम)

 सदक़ा और दानः

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रश्न किया गया कि कौन सा दान श्रेष्ठ है?तो आप ने फरमायाः

أفضل الصدقة صدقة في رمضان     أخرجه الترمذي عن أنس

  रमज़ान में सदक़ा करना    तिर्मिज़ी

स्वयं प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सब से बढ़ कर दानशील थे और रमज़ान में आप की दानशीलता अधिक बढ़ जाती थी। हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि. फ़रमाते हैं किः

كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود الناس ، وكان أجود ما يكون في رمضان حين يلقاه جبريل ، وكان يلقاه في كل ليلة من رمضان فيدارسه القرآن ، فلرسول الله صلى الله عليه وسلم أجود بالخير من الريح المرسلة ” . رواه البخاري .

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों में सब से अधिक दानशील थे परन्तु रमज़ान के महीनें में जिस समय आप हज़रत जिब्रील अ0 से मिलते थे आप की दानशीलता में बढ़ोत्तरी हो जाती थी और उस समय आप हर प्रकार की भलाई के लिए तेज़ हवा से भी अधिक दानशील होते थे।” (बुखारी,मुस्लिम)

इस लिए यदि आप चाहते हैं कि अल्लाह तआला आप को गुनाहों से पवित्र एवं मुक्त कर दे तो आप इस शुभ अवसर पर अल्लाह का दिया हुआ माल अल्लाह के रास्ते में ख़ूब ख़र्च करें और याद रख़ें कि दान करने से माल कम नही होता बल्कि माल में बढ़ोतरी होती है, अल्लाह तआला ने फ़रमायाः

  अल्लाह ब्याज को घटाता और मिटाता है और सदक़ों को बढ़ाता है। (सुरह बक़रा 276)

रमज़ान में इफ़्तार करानाः

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान हैः

जो व्यक्ति रमज़ान में किसी का रोज़ा खुलवाये तो अल्लाह तआला उसके गुनाह क्षमा कर देगा उसको नरक से मुक्ति प्रदान करेगा और इफ़्तार कराने वाले को रोज़ेदार के बराबर पुण्य मिलेगा और रोज़ेदार के पुण्य में कोई कमी न होगी। लोगों ने कहा, हे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम! हम सब के पास इतना कहाँ है कि रोज़ेदार को खाना खिलायें।, आप ने फरमाया: केवल एक खुजूर से या दूध और पानी के एक घोंट से इफ्तार करा देना भी काफी है। (इब्ने ख़ुज़ैम:)

तरावीह की नमाज़ः

रमज़ान में तरावीह की नमाज़ सुन्नत है, उसके महत्व को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस प्रकार बयान किया हैः

जिस मोमिन ने पुण्य की नीयत से रमज़ान की रातों में क़याल किया उसके पिछले गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं। (बुख़ारी, मुस्लिम)

इस लिए तरावीह की नमाज़ अवश्य पढ़नी चाहिए, सही हदीसों से तरावीह वित्र सहित ग्यारह रकअत प्रमाणित है, आठ रकअत तरावीह और तीन रकअत वित्र।

हज़रत आइशा रज़ि0 से प्रश्न किया गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान की रातों में कितनी रकअतें पढ़ते थे ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि:

आप रमज़ान के दिनों या दूसरे दिनों में ग्यारह रकअत से अधिक नहीं पढ़ते थे। (बुख़ारी, मुस्लिम)

इस लिए तरावीह की नमाज़ ग्यरह रकअत पढ़ना ही उत्तम है हाँ यदि कोई ग्यारह रकअत से अधिक पढ़ना चाहे तो पढ़ सकता है। क्यों कि हदीस में है:

صلاة الليل مثنى مثنى فإذا خشي أحدكم الصبح صلى ركعة واحدة توتر له ما قد صلى رواه مسلم  

रात की नमाज़ दो दो रकअत करके अदा की जाए, यदि किसी को फ़ज्र उदय होने का भय हो तो एक रअकत पढ़ ले ताकि जो नमाजें पढ़ी हैं वित्र बन जायें। (मुस्लिम)

इस लिए यदि कहीं पर ग्यारह रकअल से अधिक तरावीह की नमाज़ हो रही हो और इमाम एक ही हो तो उत्तम यह है कि इमाम के नमाज़ से फ़ारिग़ होने तक इमाम की इक़तिदा की जाए ताकि पूरी रात नमाज़ पढ़ने का पुण्य मिल सके। अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फ़रमायाः

 من قام مع الامام حتى ينصرف كتب له قيام ليلة. رواه ابو داود

जिसने इमाम के नमाज़ से फ़ारिग़ होने तक इमाम के साथ क़याम किया उसके लिए पूरी रात क़याम करने का सवाब लिखा जाता है। (अबूदाऊद)

कुरआन करीम का पठनः

इस नहीने में कुरआन  करीम का अधिक से अधिक पठन करें हर नमाज़ के बाद अनुवाद सहित कुछ आयतों के पठन की आदत बना लें क्योंकि इसी महीने में कुआन जैसे अन्तिम ईश-ग्रन्थ का अवतरण हुआ। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद हैः

” रोज़ा और क़ुरआन बन्दे के लिए क़ियामत के दिन अनुशंसा करेंगे रोज़ा कहेगा , हे रब ,मैंने उसे दिन में खाने और पीने रोका था, और कुरआन कहेगा, मैंने उसे रात के समय सोने से रोका था , तू उनके प्रति हमारी अनुशंसा स्वीकार कर।”। ( निसाई,अहमद )

रमज़ान के इस शुभ महीने में इस्लाम के कुछ विद्धान हर तीन दिन में कुरआन समाप्त करते थे, एमाम ज़ुहरी रहि0 रमज़ान के आते ही विद्धानों की संगति और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम प्रवचनों का पाठ छोड़ कर कुरआन के पाठ में लग जाते थे।

रमज़ान में उमराः

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया

” रमज़ान में उमरा करने का पुण्य हमारे साथ हज्ज के समान है।”   (बुख़ारी, मुस्लिम)

अल्लाह तआला ने अपनी विशेष कृपा से इस महीने में उमरा का सवाब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ हज्ज के सवाब के समान कर दिया है। इस लिए जिस मुसलमान को सामथ्रय प्राप्त हो उसे रमज़ान में अवश्य उमरा करना चाहिए।

ज़िक्र, दुआ और इस्तिग़फ़ार का एहतमामः

रमज़ान के दिन बड़े बहुमूल्य हैं जिनको ज़िक्र, दुआ और इस्तिग़फ़ार से आबाद करना चाहिए, विशेष रूप में इफ़तार के समय अधिक से अधिक दुआ करने की कोशिश करनी चाहिए, उसी प्रकार रात के अन्तिम भाग में जग कर अल्लाह से दुआ करनी चाहिए जिसमें अल्लाह समाए दुनिया पर उतरता है और घोषणा करता हैः है कोई अपने पापों की क्षमा चाहने वाला कि हम उसके पापों को क्षमा कर दें। (बुख़ारी,मुस्लिम)

रिश्तेदारों का ख़्यालः

रमज़ान के महीने में रिश्तेदारों की ज़यारत करनी चाहिए उनके हाँ उपहार आदि भेजने का प्रबंध करना चाहिए, खाने पीने की चीज़ों का लेन देन होना चाहिए। यदि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक न हो तो आर्थिक रूप में भी उनकी सहायता करनी चाहिए। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि मैं ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुनाः

من سره أن يبسط في رزقه وينسأ في أجله فليصل رحمه   ومعنى ينسأ أي يؤخر [رواه البخاري] . 

जिसे यह बात खुश करती हो कि उसकी जीविका में वृधि हो, और उसकी आयु लम्बी हो जाए तो उसे चाहिए कि रिश्तेदारों का ख़्याल करे।

और इब्ने मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः

صلة الرحم تزيد في العمر  حسنه المناوي في فيض القدير وصححه الألباني في صحيح الجامع

रिश्तेदारों का ख़्याल करने से आयु में वृधि होती है।

रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार इस्लाम की बहुत बड़ी विशेषताओं में से एक है जिस पर इस्लाम ने उभारा है और उन से सम्बन्ध काटने से रोका है, अल्लाह ने 19 आयतों में इस का आदेश दिया है और 3 आयतों में रिश्तेदारों से सम्बन्ध काटने वालों को सख़्त यातना की धमकी दी है।

रमज़ान से लाभान्वित होने के लिए 24 घंटे का चार्टः

1. फज्र की नमाज़ जमाअत से पढ़ कर मस्जिद में बैठे सूर्योदय तक कुरआन के पठन और            

   ज़िक्र के एहतमाम में लगे रहें।

2. सूर्योदय के बाद दो रकअत चाश्त की नमाज़ अदा कर लें। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम का इर्शाद हैः

   ” जिस व्यक्ति ने फज्र की नमाज़ अदा किया फिर अपने स्थान पर बैठा ज़िक्र में व्यस्त रहा यहाँ तक कि सूर्योदय हो गया फिर दो रकअत नमाज़ पढ़ी तो उसे एक हज्ज और एक उमरा का पूरा पूरा पुण्य मिलता है।” ( तिर्मिज़ी)

3. चाश्त की नमाज़ की अदायगी के बाद से काम पर जाने तक विश्राम कर लें।

4. जिसे जुहर के बाद समय मिलता हो उसके लिए उचित है कि अस्र की नमाज़ तक विश्राम कर ले ताकि तरावीह की नमाज़ में आसानी हो।

5. अस्र की नमाज़ के बाद सन्भवत: कुरआन का पठन करें, फिर मग्रिब की नमाज़ पढ़ें और खाना खालें, फिर  ईशा की नमाज़ पढ़ें, तरावीह पढ़ें, फिर अपने दैनिक कामों को समाप्त करके सो जायें।

6. सहरी के समय जागें, अल्लाह का नाम लें, वुज़ू करें, सम्भवत: नमाज़ पढ़ें, सहरी के बाद अल्लाह की   प्रार्थना और गुनाहों से पश्चाताप में लगे रहें, यहाँ तक कि फज्र का समय हो जाए।

 

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