कुरआन क्या है ?

इस्लाम शांति का धर्म है या हिंसा का?

peace world अरबी भाषा में शांति को अम्न कहते हैं, और अम्न शब्द का प्रयोग क़ुरआन में 48 स्थानों पर हुआ है, और अम्न का विपरीत शब्द फसाद है इसकी निंदा में कुरआन की कम से कम पचास आयतें मिलती हैं, उसी प्रकार क़ुरआन में शान्ति के लिए अस्सलाम का शब्द आया है जो अनुमांतः 50 स्थान पर प्रयोग किया गया है। जिसका अभिप्राय यह है कि इस्लाम शांति पर आधारित धर्म है, इस्लाम के शांति और सलामती पर आधारित धर्म होने का प्रमाण उसके नाम से ही विदित है, इस्लाम का अर्थ होता है हुक्म मानना, आत्मसमर्पण (Surrender) एवं आज्ञापालन (Submission)। इसी से सलाम निकला है जिसका अर्थ शांति एवं सलामती होता है। उसी तरह शब्द “ईमान” भी अम्न से बना है, और इस धर्म को मानते वाला मोमिन कहलाता है। अल्लाह तआला का एक गुणात्मक नाम भी अल-मुमिन (निश्चिन्तता प्रदान करने वाला) है, उसी तरह अल्लाह का दूसरा गुणात्मक नाम “अस्सलाम” (सर्वथा सलामती) भी है।

इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ” सारे संसार के लिए बस एक सर्वथा दयालुता ” (अल-अंबियाः 107) हैं, इस्लाम की अंतिम किताब कुरआन का आरंभ ही “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” से होता है, जिसका अर्थ है: “शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु अत्यंत कृपाशील है।”. इस्लाम मनुष्य को जिस स्वर्ग की ओर बुलाता है उसका नाम” अस्सलाम” अर्थात् सलामती का केंद्र है। और मुसलमान मुलाकात के समय ” अस्सलामु-अलैकुम” के माध्यम से जिस वाक्य का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं उसमें सुरक्षा ही सुरक्षा और सलामती ही सलामती है। कि वह इस वाक्य के माध्यम से तीन प्रकार की प्रार्थना करता है, अल्लाह तुझ से हर प्रकार की बुराई दूर करे, तुझे हर प्रकार की अच्छाइयाँ प्रदान करे और फिर तुम्हारी अच्छाइयों को हमेशगी और स्थायीकरण प्राप्त हो जाए।  

 इस्लाम की दृष्टि में शांति का क्या महत्व है इसका सही अनुमान उसी समय लगाया जा सकता है जब हम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने से पूर्व संसार की क्या स्थिति थी उसे ध्यान में रखें फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नबी बनाए जाने के बाद स्थितियाँ कैसे परिवर्तित हुईं इन को सामने रखें, आख़िर यह कैसा परिवर्तन था कि खून के प्यासे और जान के शत्रु दिल और जान से गले लग गए, जानों से खेलने वाले जानों के रक्षक बन गए, परदेसियों को लूटने वाले उन पर सब कुछ लुटाने के लिए तैयार हो गए, बच्चियों को ज़िंदा दफन करने वाले बच्चियों की आंखों में आंसू देखना गवारा नहीं करते, अपने स्वार्थ के लिए जीने वाले दूसरों के लिए जीने लगे, तात्पर्य यह कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आने के बाद ऐसा शांतिपूर्ण, संतोषजनक और इत्मीनान बख्श समाज बना जिसका उदाहरण पूरी मानवता पेश करने से आजिज़ है।

इस्लाम की दृष्टि में मानव जीवन का सम्मान इतना महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति की अकारण-हत्या को पूरी मानवता की हत्या सिद्ध किया है। क़ुरआन कहता हैः

مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا ۚ – سورة المائدة : 32 

“जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इनसानों की हत्या कर डाली।”

यह है इस्लाम का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट कि एक व्यक्ति की अकारण हत्या इस्लाम की दृष्टि में सम्पूर्ण मानवता की हत्या ठहरती है। और किसी इंसान की जान को बचा लेना मानो सारी मानवता को जान प्रदना करना है। इस्लामी आतंकवाद का हल्ला मचाने वाले ज़रा इस्लाम की इस शिक्षा पर विचार करें, अब हमें कोई बता सकता है कि क्या दुनिया में कोई ऐसा धर्म या नियम है जिसने एक व्यक्ति की हत्या को सारी मानवता की हत्या करार दिया हो? नहीं और कदापि नहीं, तो फिर बात बिल्कुल स्पष्ट है कि इस्लाम ने मानव जीवन का सम्मान जितने ठोस शब्दों में शिक्षा दी है, इसका उदाहरण दुनिया का किसी कानून में नहीं मिलता।

इस्लाम शांति का इतना इच्छुक है कि वह ग़ैर मुस्लिम जो इस्लामी शासन में अच्छे पड़ोसियों की तरह रहने के पाबंद हों इस्लाम उन्हें भी जान, माल इज़्ज़त की पूरा आज़ादी प्रदान करता है।

सही बुखारी की रिवायत के अनुसार अल्लाह के संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

من قتل مُعاهَدًا لم يَرَحْ رائحةَ الجنَّةِ ، وإنَّ ريحَها توجدُ من مسيرةِ  أربعين عامًا – صحيح البخاري: 3166

 ” जो कोई अनुबंध किये गए ग़ैर मुस्लिम को क़त्ल कर दे, वह स्वर्ग का सुगंध भी न पा सकेगा जब कि उसका सुगंध चालीस वर्ष की गति में आ रहा होगा।”

और क्या आप जानते हैं कि मुसलमान की परिभाषा क्या है? सुनन तिर्मिज़ी की रिवायत के अनुसार मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुसलमान की परिभाषा करते हुए कहा:

 ألا أُخْبِرُكُمْ بالمؤمنينَ ؟ مَنْ أَمِنَهُ الناسُ على أَمْوَالِهمْ و أنْفُسِهمْ  والمسلمُ مَنْ سَلِمَ الناسُ من لسانِهِ ويَدِه – السلسلة الصحيحة549  

“क्या मैं तुम्हें मोमिन के सम्बन्ध में न बताऊँ ? (मोमिन वह है) जिससे लोग अपने मालों और जानों के प्रति सुरक्षित रहें, और मुसलमान वह है जिसकी ज़ुबान और हाथ से लोग सुरक्षित हों।” ( सहिहाः 549)

ये हैं बहुमूल्य प्रवचन दया के प्रतिक मुहम्मद सल्ल. के। जिन पर सरसरी नज़र डालने से यह बात बिल्कुल निखर कर सामने आ जाती है कि आप की शिक्षाओं का खुलासा शांति ही है, एक मोमिन की शान नहीं कि वह रक्तपात करे और समाज में दंगा मचाए, ईमान और रक्तपात में विरोधाभास है, ईमान और डकैती में मनाफ़ात है, ईमान और कष्ट पहुंचाने में कोई तालमेल नहीं, दोनों कभी एकत्र नहीं हो सकते।

शांति-दूत मुहम्मद सल्ल. को शांति कितनी प्रिय थी, उसका व्यावहारिक नमूना देखना हो तो नुबूवत से पहले के जीवन पर भी एक दृष्टि डाल ली जाए। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नबी बनाए जाने से पूर्व शांति और अम्न की बहाली के लिए हल्फुलफ़ुज़ूल नामक एक संगठन की स्थापना की जिसमें बनू हाशिम, बनू मुत्तलिब, बनू असद, बनू ज़ुहरा और बनू तमीम को शामिल किया। अतः आप की कोशिश से संगठन के सदस्यों ने इन बातों पर सहमति जताई कि “हम देश से अशांति को दूर करेंगे” हम यात्रियों की रक्षा करेंगे, हम गरीबों की सहायता करते रहेंगे, हम जबरदस्त को अधीन पर जुल्म करने से रोका करेंगे, इस तरह आपकी हुस्नि तदबीर से समाज में शांति क़ायम हुई और लोगों के जीन माल और इज़्ज़त की सुरक्षा होने लगी।

फिर एक समय आया कि आप को नुबूवत से  सम्मानित किया गया, और आप नुबूवत के दायित्वों में लग गए, इधर आतंकवादियों का आतंकवाद अपने चरम पर पहुंच गया तो अल्लाह की अनुमति से मदीना की ओर हिजरत फरमाया। यहा आकर आप ने शांति की स्थापना हेतु बहुत प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप औस और ज़िज़रज का लंबा गृहयुद्ध समाप्त हुआ, भाईचारगी का वातावरण बना, सब परस्पर सहमत हो गए, यहां पर आप ने शांति के लिए समझौते भी किए, अनुबंध के प्रावधानों पर मदीने के सभी निवासियों के हस्ताक्षर लिए गए, उसके बाद सफर कर के आस पास के क़बीलों को भी इस समझौते में शामिल किया। उद्देश्य मात्र यह था कि समाज में शांति बनी रहे।

फिर मदीना में बसने के बाद काफिरों के साथ जो युद्ध हुए उनका उद्देश्य भी स्थाई अम्न की स्थापना था, जिनका स्लोगन था “इस्लाम अम्न का प्रतिक धर्म है, इस्लाम अल्लाह का दीन और अम्न का संदेश है, अम्न की स्थापना के लिए ही आप हुदैबिया की संधि के लिए सहमत हुए, यहाँ तक कि वह दिन भी आया कि दस हज़ार की संख्या में मुसलमान सैनिक मक्का में दाख़िल हुए, आज शांति की पहचान हो रही थी, विश्वव्यापी अम्न की नींव डाली जा रही थी, क्या इंसानियत इस महान व्यक्ति की मिसाल पेश कर सकती है कि जिन को निरंतर 21 वर्ष तक कष्ट पहुंचाया, आज अपने शत्रुओं पर विजय पाने के बाद उन्हीं को अम्न का परवाना बांट रहा है। अल्लाह अल्लाह क़ुरबान जाइए आप पर और दुश्मनों के हित में आपकी क्षमा पर आपका एलान होता है:

  لاتثریب علیکم الیوم اذھبوا وأنتم الطلقاء – ضعفه الألباني في الضعيفة 3/ 307

“तुम्हारी आज कोई पकड़ नहीं की जाएगी, जाओ तम सब मुक्त हो”। (ज़ईफ़)

सारांश यह है कि इस्लाम अम्न और शांति का व्यापक और सम्पूर्ण संदेश है, जो एसे लोग और समाज का गठन करता है जो अम्न-पसंद हों और अम्न व शान्ति के रक्षक भी हों, मुस्लिम क़ौम हर युग में और हर स्थान पर अम्नपसंद होती है, शांति की स्थापना के लिए जीती है और उसी के लिए मरती है, इस्लाम में और उसके मानने वालों में आतंकवाद नहीं आ सकता और अगर आ जाए तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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