कुरआन क्या है ?

हज़रत आइशा रजी. से कम उमरी में शादी की हिकमत

Aishaअल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत आइशा रज़ी. से कम उमरी में शादी क्यों की… इस के पीछे अल्लाह के रसूल सल्ल.की क्या हिकमत थी …इस विषय पर इस लेख में प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

मुहम्मद सल्ल. के वैवाहिक जीवन पर एक नज़र डालने से कुछ बातें उभर कर सामने आती हैं

पहली बातः आप सल्ल. 25 वर्ष की अवधि ऐसे समाज में बिताते हैं जो हर प्रकार की बुराइयों से लतपत था परन्तु आप ऐसी अंधकार में बिल्कुल पवित्र और पाकदामन देखाई देते हैं।

दूसरी बातः 25 वर्ष की उम्र में एक महिला हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा से विवाह किया, जो उम्र में आप से 15 वर्ष बड़ी थीं, उस से पहले दो परुषों की पत्नी रह चुकी थीं।

तीसरी बातः पचास वर्ष तक (अर्थात् पूरे 55 वर्ष) इसी एक पत्नी पर गुज़ारा करते हैं, किसी अन्य महिला से विवाह की इच्छा तक व्यक्त नहीं की।.

चौथी बातः हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा की मृत्यु के बाद ‘अपनी उम्र के पचासवें वर्ष जिस महिला (हज़रत सौदा रज़ि.) से विवाह किया वह उनकी हम-उमर और विधवा थीं.शेष 9 पत्नियों से निकाह 53 वर्ष की उम्र से 60 वर्ष की उम्र के बीच हुआ।

यह सारी महिलाएँ (सिवाए हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के) दो या तीन पतियों की पत्नियाँ रह चुकी थीं।अपनी उम्र के अंतिम तीन वर्षों में जबकि अरब के बड़े भाग पर आपकी सत्ता स्थापित हो चुकी थी आपने कोई शादी नहीं की।.

उपरोक्त विवरण इस संदेह की जड़ काट देती है कि आपके बहुविवाह का उद्देश्य भोग विलास था। क्या यह आरोप उस व्यक्ति पर लगाया जा सकता है जो अपनी जवानी के दिन केवल एक महिला की संगत में बिताए और वह भी ऐसी जो उम्र में उस से 15वर्ष बड़ी हो और इस से पहले दो पतियों की पत्नी रह चुकी हो ?

इस मुद्दे पर दो पहलुओं से विचार करने की आवश्यकता है:

एक यह कि यदि आप पर यौन इच्छा हावी थी तो उसकी पूर्ति का अवसर वह था जब नबी बनने के पांचवें छठे वर्ष उनके विरोधी निमंत्रण को रोकने में पूरा ज़ोर लगा रहे थे और आपके सामने पेशकश कर रहे थे कि अगर तुम्हारे इस निमंत्रण का कोई सांसारिक उद्देश्य हो तो हम तुम्हें अपना सरदार बना लेते हैं, तुम्हारे कदमों में धन दौलत के ढेर लगा देते हैं और अरब की सबसे सुन्दर महिला से विवाह कर देते हैं लेकिन आपने उनकी इस पेशकश को बिल्कुल ठुकरा दिया ( तफ्सीर इब्ने जरीर 30187)

उस समय आपकी शादी में पचपन वर्ष की एक बूढ़ी महिला (हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा) थीं.

दूसरी बात यह कि जब आपने अपने संदेश की घोषणा की तो शत्रुओं तथा विरोधियों ने आप पर तरह तरह के आरोप लगाए, कवि कहा, पागल और जादूगर कहा, और अन्य आरोप लगाए, लेकिन आपके कट्टर से कट्टर दुश्मन ने भी आप पर यौन उत्तेजना का आरोप न लगाया. अगर उन्होंने इस सम्बन्ध में मुहम्मद सल्ल. के अंदर कुछ भी देखा होता तो उनके खिलाफ दुष्प्रचार का इस से बेहतर माध्यम कोई और नहीं हो सकता था

आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से विवाहः अब हम आते हैं आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से विवाह की हिकमत की ओर, मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के अन्तिम संदेष्टा थे, आपके बाद कोई संदेष्टा आने वाला नहीं था और इस्लाम महा-प्रलय के दिन तक एक जीवन व्यवस्था के रूप में मानव का मार्गदर्शन करने वाला था, इस लिए इस धर्म को हर तरीक़े से पूर्ण करने की आवश्यकता थी, अतः आपकी पत्नी ख़दीजा रज़ी. का जब नुबूवत के दसवें वर्ष रमज़ान में देहांत हो गया तो आपने उसके चार वर्ष बाद यह आवश्यक समझा कि आपके वैवाहिक जीवन में कोई छोटी आयु की महिला प्रवेश करे जिसने अपनी आँखें इस्लामी वातावरण में खोली हो, और जो नबी सल्ल. के परिवार में आए ताकि उसकी उत्तम रूप में शिक्षा दिक्षा का प्रबंध हो सके और वह मुसलमान महिलाओं और पुरुषों में इस्लामी शिक्षाएं फैलाने का माध्यम बन सके। इस उद्देश्य के अंतर्गत अल्लाह ने आईशा रज़ि. का चयन किया और हिजरत से तीन वर्ष पूर्व शव्वाल के महीने (मई 620) में हज़रत आईशा रज़ि.से आपका निकाह हुआ, और तीन वर्ष के बाद जब वह अधिकतर विद्वानों के कथनानुसार 9 वर्ष की हो गईं और उनकी माता हज़रत उम्मे रूमान को संतुष्टि प्राप्त हो गई कि अब वह इस आयु को पहुंच चुकी हैं जिसमें उनकी विदाई की जा सकती है तो उनकी विदाई कर दी। ( सही मुस्लिम)

अल्लाह के रसूल सल्ल. का जो समय घर पर गुज़रता था उस में ऐसी समझदार और बुद्धिमान महिला की ज़रूरत थी जो आपकी एक एक बातों को याद करे, हज़रत आइशा पहले से ही इस्लामी वातावरण में आंखें खोली थीं, फिर जब अल्लाह के रसूल सल्ल. के घर आईं तो हम देखते हैं कि हज़रत आइशा रज़ि. ने अपनी कम-उमरी में क़ुरआन और हदीस की शिक्षाओं का ठोस ज्ञान प्राप्त कर लिया, और इसे बाद के लोगों तक पहुंचाया। हज़रत आइशा की अपनी कथनी के अतिरिक्त उन्हों ने मुहम्मद सल्ल. की जो हदीसें (कथनी और करनी) बयान की हैं उनकी संख्या 2210 है। अबू हुरैरा रज़ी. को छोड़ कर सब से अधिक रिवायत बयान करने वाली महिला आप ही हैं। यह है वह वास्तविक तत्वदर्शिता जिसके अंतर्गत अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत आईशा रज़ि. का चयन किया।

दूसरी बात यह भी है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से शादी का सपना देखा था, सही बुखारी में हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें कहा: सपने में मुझे तू दो बार दिखाई गई थी, मैं तुझे रेशमी कपड़े में लिपटी हुई देखा, कहा गया कि यह तेरी पत्नी है जब कपड़ा हटा तो देखा कि तू है। मैंने कहा कि अगर यह अल्लाह की ओर से है तो फिर अल्लाह उसे पूरा करेगा। (सही बुखारी, हदीस संख्या 3682). फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के अंदर बचपन में जो समझदारी और ज़ेहानत देखी थी, इस कारण उन से शादी करना पसंद किया ताकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के संदेश को दूसरों तक भली भांति सही तरीके से नकल कर सके। फिर हुआ भी ऐसा ही कि आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा सहाबा के लिए ज्ञान का स्रोत बन गईं जिन से बड़े बड़े सहाबा धार्मिक ज्ञान के विषय में सम्पर्क करते थे।

अब यदि कोई इसके बावजूद अपने मन में किसी प्रकार का संदेह पाले हुआ हो तो उसकी सेवा में हम निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत करते हैं :

(1) हज़रत आईशा विदाई की क्षमता रखती थीं: सब से पहले इस्लाम में निकाह सही होने के लिए बालिग़ होना ज़रूरी नहीं है। (सूरः अल-माइदा 4) जबकि हज़रत आइशा के सम्बन्ध में प्रमाणित रूप में यह सिद्ध है कि उनकी शारीरिक शक्ति बहुत अच्छी थी, एक तो स्वयं अरब की गर्म हवा और वातावरण में महिलाओं के असाधारण विकास और प्रायद्वीप की क्षमता पाई जाती है, दूसरे साधारण रूप में यह भी देखा गया है कि जिस तरह कुछ लोगों में मानसिक विकास की असाधारण क्षमता होती है, उसी तरह कुछ लोगों के शरीर में वृधि की विशेष क्षमता होती है. इसलिए बहुत कम उम्र में ही वह शक्ति हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा में पैदा हो गई थी जो पति के पास जाने के लिए एक औरत में आवश्यक है. दाऊदी ने लिखा हैः “हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा बहुत उत्तम रूप में जवानी के चरम तक विकास की थीं” (नववी 456 / 3)

हज़रत आयशा की प्राकृतिक स्थिति तो ऐसी थी ही, उनकी मां ने उनके लिए ऐसा विशेष व्यवस्था किया था जो उनके लिए शारीरिक विकास में सहायक सिद्ध हुआ। अतः अबू दाऊद भाग 2 पृष्ठ 89 और इब्ने माजा पृष्ठ 642 में स्वयं हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा का बयान सूचीबद्ध है कि “मेरी माँ ने मेरे शारीरिक विकास के लिए बहुत सारी तदबीरें कीं. अंततः एक उपाय पर्याप्त लाभकारी सिद्ध हुआ, और मेरी शरीरिक परिस्थितियों में अच्छा परिवर्तन हो गया।

(2) अल्लाह के रसूल से पहले आइशा से शादी के लिए अबू बकर के पास पैग़ामे निकाह आ चुका थाः इस बिंदु को भी नहीं भुलना चाहिए कि अल्लाह के रसूल सल्ल. के आइशा से विवाह करने की इच्छा ज़ाहिर करने से पहले अबू बकर के पास किसी अन्य का पैग़ाम आ चुका था, इसी लिए जब अल्लाह के रसूल ने अबू बकर रजीयल्लाहु अन्हु से आईशा से विवाह के प्रति अपनी इच्छा प्रकट की तो उन्हों ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! आप से पहले एक साहब ने आइशा से विवाह करने की इच्छा प्रकट की है,पहले उन से पूछ लेते हैं फिर हम आपको उत्तर देंगे। जब वह उसके पास गए तो उसे नशे की स्थिति में पाया, अतः तुरंत वहां से लौट गए और अल्लाह के रसूल को जवाब भेज दिया कि हमें आपका रिश्ता मंजूर है। इस से ज्ञात यह होता है कि उस वातावरण में छ वर्ष की बच्ची का विवाह साधारण बात थी।

(3)  आइशा की माँ ने अपनी इच्छा से विदाई की थीः फिर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मुहम्मद सल्ल. की ओर से विदाई की मांग किए बिना हज़रत आईशा रज़ीयल्लाहु अन्हा को खुद उनकी माँ ने आपकी सेवा में भेजा था और दुनिया जानती है कि कोई माँ अपनी बेटी की दुश्मन नहीं होती, बल्कि लड़की सबसे ज़्यादा अपनी माँ की प्रिय और महबूब होती है. इसलिए असंभव है कि उन्होंने वैवाहिक संबंध स्थापित करने की क्षमता से पहले ही उनकी विदाई कर दी हो।

(4) अपवाद रूप में कोई लड़की अपनी आदत के खिलाफ़ 9वर्ष ही में बालिग़ हो सकती है: अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि अरब में आम तौर पर लड़कियां 9 वर्ष में बालिग न होती हों तो इस में आश्चर्य की क्या बात है, चिकित्सा से यह सिद्ध है कि अपवाद रूप में अपनी ठोस स्वास्थ्य के कारण कोई लड़की अपनी आदत के खिलाफ़ 9वर्ष ही में बालिग़ हो जाएं। लेकिन जो मन और मस्तिष्क नकारात्मक सोच के आदी बन गए हों और वह केवल संदेह के जाल बुनने के आदी हों वह इस घटना को आश्चर्यजनक बनाकर ही पेश करेंगे, लेकिन जो लोग हर तरह की मानसिक शत्रुता और निष्पक्षता से बाहर निकलकर न्याय के साथ इतिहास का अध्ययन करना चाहते हैं वे जान लें कि बहुत प्रामाणिक तरीके से यह साबित होता है कि अरब में कुछ लड़कियां 9 वर्ष की मां और 18 वर्ष की उम्र में नानी बन गई हैं। सुनन दारक़ुतनी में हैः

حدثني عباد بن عباد المهلبي قال: أدركت فينا يعني المهالبة امرأة صارت جدة وهي بنت ثمان عشرة سنة ، ولدت تسع سنين ابنة ، فولدت ابنتها لتسع سنين فصارت هي جدة وهي بنت ثمان عشرة سنة . (دارقطني 3/323 ط لاهور باكستان)

इबाद बिन इबाद महलबी ने मुझे बताया कि हमारे समुदाय महलब में एक लड़की 18 साल की उम्र में नानी बन गई, 9साल की उम्र में एक बच्ची जनी, फिर इस की बच्ची को 9 साल की उम्र में ही एक बच्चा हुआ. इस तरह वह 18 साल की उम्र में नानी बन गई “. (दारक्नी, भाग 3, पृष्ठ 323, प्रकाशित : लाहौर पाकिस्तान)

स्वयं हमारे देश हिन्दुस्तान में यह सूचना काफी अनुसंधान के बाद प्रकाशित हुई है कि विक्टोरिया अस्पताल दिल्ली में सात साल से कम उम्र की लड़की ने एक बच्चा जना है. (देखिए पत्रिका “मदीना” बिजनौर, प्रथम जुलाई 1934 / संदर्भ नुसरतु हदीस पृष्ठ 171 )

जब हिन्दुस्तान जैसे नरम और संतुलित पर्यावरण तथा जलवायु वाले देश में सात वर्ष की लड़की में क्षमता पैदा हो सकती है तो अरब जैसे गर्म जलवायु वाले देश में 9वर्ष की लड़की में क्षमता का पैदा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है . यही कारण है कि हज़रत अली रज़ी. ने अपनी लड़की उम्मे कुल्सुम का निकाह उरवा बिन ज़ुबैर से और उरवा बिन ज़ुबैर ने अपनी भतीजी का विवाह अपने भतीजे से और अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ी. की पत्नी ने अपनी लड़की का निकाह इब्नुल-मुसय्यिब बिन नुखबह से कम-उमरी में किया। (अल्फ़िक्हुल इस्लामी व अदिल्लतहु भाग 7, पृष्ठ 180)

इन लोगों का कम उमरी मैं अपनी लड़कियों का विवाह कर देना भी इस बात का खुला हुआ प्रमाण है कि कुछ लड़कियों में मामूली उम्र में ही शादी की क्षमता पैदा हो जाती थी, तो अगर हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह 6वर्ष की उम्र में हुआ और विदाई 9 वर्ष की आयु में हुई तो इस में क्या विरोधाभास है कि उन में उस समय यौन क्षमता पैदा नहीं हुई हो. जैसा कि अभी साबित हो चुका है कि उनकी मां ने विशेष रूप में उनकी शारिरीक वृधि की ओर ध्यान दिया था। तात्पर्य यह कि पति से मिलने के लिए एक औरत में जो सामर्थ्य आवश्यक हो सकता है वह सब हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा में मौजूद था।

हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के अतिरिक्त सभी पत्नियाँ विधवा या तलाक शुदा थीं, हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से कम उमरी में इसलिए निकाह किया गया ताकि वे अधिक समय तक आप से ज्ञान प्राप्त कर सकें. और हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के माध्यम से लोगों को धर्म व शरीयत से सम्बन्धित विभिन्न ज्ञान प्राप्त हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि मुहम्मद सल्ल. के देहांत के बाद हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा 48वर्ष जीवित रहीं, और समाज और उम्मत का सही पथ की ओर मार्गदर्शन करती रहीं।

(5)इस विषय को आपके युग के किसी शत्रु ने नहीं उठायाः सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि जब मुहम्मद सल्ल. ने लोगों को एक अल्लाह की ओर बोलाना शुरू किया तो लोगों ने हर प्रकार से आपका विरोध किया लेकिन किसी ने आपकी पवित्रता को दोषित करने के लिए हज़रत आईशा से आपके विवाह के विषय को नहीं उठाया…क्यों कि उनकी दृष्टि में मुहम्मद सल्ल. ने कोई आश्चर्यजनक काम नहीं किया था। बल्कि यह बात उनके बीच साधारण समझी जाती थी। और जब उस वातावरण में यह काम कोई दोषित नहीं था तो आज अपनी तुच्छ मानसिकता औऱ बुद्धिहीनता का प्रमाण पेश करते हुए मुहम्मद सल्ल. के इस विवाह के विषय को उछालना कहां का न्याय हो सकता है।

यह तथ्य है कि आप के सिवा कोई ऐसा व्यक्ति दुनिया में नहीं गुज़रा जो पूर्ण 23वर्ष तक हर समय और हर स्थिति में सब के सामने जीवन बसर कर ले, सैकड़ों हजारों आदमी उसकी एक एक हरकत की खोज में लगे हों. अपने घर में पत्नियों और अपने बच्चों के साथ व्यवहार करते हुए भी उसकी जाँच हो रही हो और इतनी गहरी नज़र के बाद न केवल यह कि उसके चरित्र पर एक काला छींट तक नजर नहीं आता, बल्कि यह साबित होता है कि आपने दूसरों को जो कुछ शिक्षा दिया, खुद आपका जीवन इस शिक्षा का पूरा आदर्श था, उस से आगे बढ़ कर यह साबित होता है कि इस लंबे जीवन में कभी एक पल के लिए भी आप न्याय तक़वा, सच्चाई और पवित्रता के उच्च स्थान से नहीं हटते हैं, बल्कि यह साबित होता है कि जिन लोगों ने आपको सब से निकट से देखा वही सब से अधिक आपके प्रेमी हुए।

इसी लिए एक इसाई वैज्ञानिक डा0 माइकल एच हार्ट अपनी पुस्तक The 100(एक सौ) में मानव इतिहास पर प्रभाव डालने वाले संसार के सौ अत्यंत महान विभूतियों का वर्णन करते हैं तो प्रथम स्थान इसाई होने के बावजूद ईसा अलै. को नहीं अपितु मुहम्मद सल्ल. को रखता है और उसका कारण यह बताता है कि “आप इतिहास के एक मात्र व्यक्ति हैं जो अन्तिम सीमा तक सफल रहे धार्मीक स्तर पर भी और सांसारिक स्तर पर भी”।

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