मुसलमानों को बहुत सुस्त देखता हूं…

ismailइस्माईल भाई बिहार की राजधानी पटना में किसी कम्पनी में कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। पहले ईसाई थे अल्लाह ने मुस्लिम दोस्तों की संगत प्रदान की जिनके अच्छे व्यवहार से प्रभावित हुए तो इस्लाम का अध्ययन आरम्भ किया। उसी समय अहमद दीदात की एक पुस्तक उनके हाथ लगी, जिसने उनके लिए इस्लाम का दरवाज़ा खोला…अंततः उन्होंने  इस्लाम के प्रति अपनी रुचि प्रकट करते हुए दीदात को अफ्रिक़ा एक पत्र  लिखा और कुछ इस्लामी पुस्तकों की माँग की, उन लोगों ने तुरन्त उनके पास अपनी प्रकाशित पुस्तकें भेज दीं…उनका अध्ययन करते ही दिल की दुनिया बदल गई और इस्लाम के हो कर रह गए। कुछ सप्ताह पूर्व जब हमें उनके साथ बैठने का शुभ अवसर मिला तो उनकी बातें सुन कर ईमान ताज़ा हो गया…उनका कहना थाः

 

(1) मैं ने जब से इस्लाम स्वीकार किया है तब से अब तक मेरी तहज्जुद की नमाज़ न छूट सकी है।

 

(2) मैंने सूरः अर्रहमान को इस्लाम स्वीकार करने से पहले ही याद कर लिया था।

(2) मैं ईसाइयों को अपने धर्म के प्रचार में बहुत चुस्त देखता हूं हालाँकि वह बातिल पर हैं जब कि मुसलमानों को बहुत सुस्त देखता हूं हालांकि वह हक़ पर हैं। ऐसा क्यों है मुझे समझ में नहीं आ रहा है।

 

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