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रजब के महीना में कोई इबादत प्रमाणित नहीं

rajabअभी हम रजब के महीने से गुजर रहे हैं, जो चार पवित्र महीनों में से एक है, इन चार महीनों में विशेष रूप से एक आदमी को अल्लाह की अवज्ञा से बचना चाहिए, इसके अलावा इस महीने की कोई विशेष इबादत साबित नहीं है। न इस महीने में विशेष रूप से नमाज़ पढ़ना साबित है, न इस महीने में विशेष रोज़े रखना साबित है, न इस महीने में विशेष दुआ करना साबित है और न ही इस महीने में किसी तरह की इबादत साबित है।

हाफिज इब्न हजर रहिमहुल्लाह कहते हैं: रजब के महीने में विशेष रूप में रजब की वजह से रोज़े की फज़ीलत सही हदीसों से साबित नहीं। 27 रजब का रोज़ा जो हजारी रोज़ा के नाम से प्रसिद्ध है। इस बारे में सारी रिवायतें गढ़ी हुई हैं।

रजब की 27वीं रात में वर्तमान युग में तरह तरह की बिदअतें पाई जाती हैं, इस रात में हलवा बनाना, रंगीन झंडयाँ और आतिशबाजी सब की सब ग़लत हैं। इन सभी मामलों को इस आधार पर निष्पादित किया जाता है कि 27 वीं रजब में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मेराज की यात्रा करवाई गई थी, हालांकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मेराज की यात्रा कब करवाई गई? इस बारे में तिथि, महीने, बल्कि साल में बहुत मतभेद पाया जाता है, इसलिए पूरे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता कि कौन सी रात वास्तव में मेराज की रात थी, जिस में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मेराज कराया गया। और अगर हम मान भी लें कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम 27 रजब को ही मेराज के लिए तशरीफ़ ले गए थे, तो केवल वही मेराज वाली एक रात सवाब वाली रात ठहरेगी, लेकिन यह पुण्य हर साल आने वाली 27 रजब की रात को कैसे प्राप्त हो सकती है। फिर दूसरी बात यह है कि इस घटना के बाद कम से कम अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दस ग्यारह साल जीवित रहे, लेकिन कहीं साबित नहीं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मेराज की रात के बारे में कोई विशेष आदेश दिया हो, या उसे मनाने को कहा हो, या यह कहा हो कि इस रात में जागना बहुत सवाब का काम है, न ही आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जागे और न आप सहाबा किराम को ताकीद फ़रमाई न सहाबा किराम ने अपने तौर पर ऐसा कोई काम किया। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दुनिया से चले जाने के बाद लगभग सौ साल तक सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अहन्हुम अज्मईन दुनिया में रहे, इस पूरी शताब्दी में एक घटना साबित नहीं है, जो सहाबा किराम ने 27 रजब को मनाया हो, इस लिए जो मोहम्मद स.अ.व. ने नहीं किया और जो आप के सहाबा किराम रज़ियल्लाहुम अज्मईन ने नहीं की, इस को दीन का हिस्सा ठहरा देना या उसे सुन्नत करार देना, या उसके साथ सुन्नत जैसा मामला करना ग़लत है।

प्रिय दर्शको! अब हमें विचार करना है कि हमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अधिक प्रेम है या सहाबा किराम को आपसे अधिक प्रेम था? तथ्य यह है कि उन से बढ़कर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रेम करने वाला कोई हो ही नहीं सकता। वे भलाई के कामों की ओर बहुत तेजी से लपकने वाले थे, इस लिए अगर इस रात में कोई विशेष इबादत होती तो वे निश्चित रूप में उसे करते और उसे अपने बाद वालों तक पहुंचाते, लेकिन ऐसा कोई भी प्रमाण हमें सहाबा के जीवन में नहीं मिलता, तो जब कोई भलाई का काम उन्हें नहीं सूझा तो वह भलाई हो ही नहीं सकती बल्कि वह बिदअत होगा, जैसा कि अल्लामा शाबती रहिमहुल्लाह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अल-इतसाम में हज़रत हुज़ैफा रज़ियल्लाहु अन्हु का क़ौल नक़्ल किया है:

کلُّ عبادةٍ لم یَتَعبَّدْھا أصحابُ رسولِ اللّٰہ فلا تَعْبُدُوھا

हर वह इबादत जिसे सहाबाٴ किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने नहीं किया, तुम भी उसे ईबादत मत समझो।

अल्लाह से दुआ है कि वह हम सब को कुरआन और हदीस के अनुसार जीवन बिताने और उन्हें हर तरफ फैलाने की तौफ़ीक़ प्रदान करे, आमीन।

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